रसालानां राजा भवति

 रसालानां राजा भवति


            @मानव

वैदिक काल से ही आम

फलों का राजा है;

आम का पेड़

वसंत ऋतु का प्रिय

और सदा रमणीय होता है; 

यह सभी रसीले फलों का 

राजा माना जाता है।


रूपेण सुभगो रम्यो 

वसन्तदूतप्रियः सदा। 

आम्रवृक्षो रसालानां

राजा भवति सर्वदा।।


भारत में आम

सिर्फ एक फल नहीं

अपितु धूप,मिट्टी की सुगंध, 

बचपन की दोपहरी

और सँस्कृति का रस है।


भारत में लोग

जेठ की गर्मी

और लू की तपिश

इसी एक फल के सहारे

सानन्द जी जाते हैं।


यहाँ गर्मी की छुट्टियाँ

यानी आम,

हर किस्म का आम!

कच्ची अमिया चुराकर 

आपस में बाँटकर

नमक मिर्च से खाना।

वो आम का अचार

जो दादी नानी धूप में सुखाती थीं;

वो आम का पना

जो लू से बचने के लिए 

आदतन पिलाया जाता था, 

वो आमरस-पूरी की दावत 

जो पूरे कुनबे को जोड़ती थी।


वह बगीचे के आम का पककर चूना!

वह छत पर खटिया लगाकर

बाल्टी में ठण्डे पानी में भरे आम

और घर भर की चारों ओर 

जुटी चुहल कमेटी।


आम के असली चाहने वाले

आम और स्वाद के बीच 

किसी प्रकार का अवरोध नहीं चाहते;

आम को धोया,दबाया

और सीधे आम के रस के 

आनंद में मग्न !


अँगुलियों से रस टपकना, 

कुहनी तक बहना

और माँ का डाँटना

जरा तमीज से खाओ'। 


इसके गौरव की अनुभूति

आज छुरी से कटे हुए

फल खाने वाले

नहीं समझ सकते।


आम हमारी सँस्कृति में

इस तरह व्याप्त है

कि रस स्वाद से कहीं भीतर 

हमारे चित्त में बैठ गया है।


आम का पेड़

एक तरह से 'कल्पवृक्ष' है;

इसका कुछ भी व्यर्थ नहीं;

पत्ते तोरण,कलश,हवन

और यज्ञ हो या अनुष्ठान,

हर शुभ काम में,

तो आम की लकड़ी समिधा के लिए

सबसे उपयुक्त मानी जाती है।


विवाह का खंभ हो

या सभी माँगलिक कार्यों में

प्रयुक्त होने वाला पीढ़ा

आम की लकड़ी का होता है।


कलश पर आम्र पल्लव रखे जाते हैं

और वसंत फागुन में आम्र मंजरी को

सबसे शुभ मानकर

इसका पूजा में प्रयोग होता है।


आम को रसाल,मानकंद,

सहकार,कामाँग,मधुदूत,

अमृतफल, सौरभ

या वसंतदूत,कामवल्लभ 

और पिकावल्लभ भी कहा गया है। 


मंदिरों के शिल्प हों या आभूषण,

हर प्रकार के परिधानों में 

'आम' या पत्ती के आकार का

मोटिफ सदाबहार है।


  ✍️मनोज श्रीवास्तव

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