श्रीअमरनाथ यात्रा
श्रीअमरनाथ यात्रा
@मानव
श्रीअमरनाथ धाम
केवल एक तीर्थ नहीं,
अपितु सनातन भारत की
तपःपरंपरा,
वैराग्य,
आत्मशुद्धि
और शिवतत्व की
सजीव अनुभूति का
दिव्य केंद्र है।
यहाँ पहुंचने वाला श्रद्धालु
केवल हिमालय की
ऊँचाइयों की यात्रा नहीं करता,
बल्कि अपने ही अंतःकरण की
गहराइयों की ओर
अग्रसर होता है।
वही परम शिव कभी
हिमलिङ्ग के रूप में दर्शन देते हैं,
तो कभी हिमालय की
निश्शब्दता में,
कभी गुफा की दिव्य शाँति में,
तो कभी श्रद्धालु के
निर्मल हृदय में
स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं।
अतः जो अनंत है,
उसे किसी एक दृश्य रूप तक
सीमित नहीं किया जा सकता।
हिमलिङ्ग भगवान की
करुणा का दिव्य प्रतीक है,
परंतु शिव की सत्ता
उससे कहीं अधिक व्यापक,
असीम और सनातन है।
शिव केवल हिमलिङ्ग में नहीं,
वे हिमालय की प्रत्येक शिला में हैं,
गुफा की प्रत्येक शीतल श्वास में हैं,
यात्रियों के प्रत्येक कदम में हैं,
प्रत्येक मंत्र में हैं,
प्रत्येक अश्रु में हैं,
भक्ति के प्रत्येक भाव में हैं
और प्रत्येक हृदय में विराजमान हैं।
पार्वती को अमरत्व का
परम रहस्य सुनाने से पूर्व
भगवान शिव ने मार्ग में
अपनी समस्त लौकिक विभूतियों
और आसक्तियों का क्रमशः
परित्याग किया।
यह प्रत्येक साधक की
आँतरिक साधना का सँकेत है;
जब तक अहंकार,ममता,
देहाभिमान और आसक्ति का
त्याग नहीं होता,
तब तक अमरकथा का
श्रवण सँभव नहीं।
अमरनाथ की पावन गुफा में
प्रवेश के साथ श्रद्धालु
उस दिव्य तपोभूमि में
उपस्थित होता है,
जहाँ स्वयं देवाधिदेव
भगवान मृत्युंजय महादेव ने
आत्मा,ब्रह्म,जन्म,मृत्यु, पुनर्जन्म,
मोक्ष और अमरत्व का
परम रहस्य प्रकट किया था।
हिमलिङ्ग का दर्शन
महादेव का प्रसाद है,
किंतु अमरनाथ की यात्रा
स्वयं महादेव की कृपा का
साक्षात अनुभव है।
आलोक:-
(भगवान शिव ने
पहलगाम में नंदी को विराम दिया।
चंदनवाड़ी में मस्तक के
चंद्र का त्याग किया।
शेषनाग में नागों का
विसर्जन किया।
महागुणस पर्वत पर
श्रीगणेश को विराम दिया।
पंचतरणी में पंचमहाभूतों के
प्रतीकात्मक अतिक्रमण द्वारा
समस्त देहाभिमान का
अतिक्रमण किया।)
✍️मनोज श्रीवास्तव

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