सँस्कृत दिवस
श्रावण पूर्णिमा
सँस्कृत दिवस
(भारतीय भाषाओं की जननी)
@मानव
भारतीय भाषाओं की जननी
और ज्ञान की भाषा
जिसकी परंपरा
किसी एक धर्म,सँप्रदाय
या देवता तक सीमित नहीं,
जो सँपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की
ज्ञान-परंपरा की सँवाहक रही,
सहस्त्राब्दियों से जिसमें
ज्ञान का सृजन,परिष्कार,सँरक्षण
और प्रसार होता आया है
वह सँस्कृत है।
इसके वेदों में ऋग्वेद प्रकृति,
अथर्ववेद औषधि,
यजुर्वेद कर्मकाण्ड
और सामवेद स्वर-सँगीत से जुड़े
ज्ञान को सामने लाते हैं।
उपनिषदों में ब्रह्म
और आत्मा सँबंधी चिंतन तक
इसकी परंपरा निरंतर
विस्तृत होती दिखाई देती है।
सँस्कृत में विकसित
साँख्य,योग,न्याय,
वैशेषिक,मीमाँसा
और वेदांत जैसे षड्दर्शनों का
मूल उद्देश्य मनुष्य को
मोक्ष की ओर ले जाना है।
महाकाव्य काल में
रामायण,महाभारत ने
धर्म,नीति,कर्म
और आत्मबोध को
जीवन से जोड़ा।
पुराणों ने जनसाधारण की
धार्मिक जीवन को दिशा दी,
खगोल,भूगोल,इतिहास,
समाज का ज्ञान
जनसुलभ बनाया;
नीति-शास्त्रों ने
नैतिक आचरण की
कसौटियाँ तय कीं।
कालिदास,भवभूति
और बाणभट्ट की रचनाएँ
इसकी साहित्यिक समृद्धि की
परिचायक हैं।
पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' में
व्याकरण का वैज्ञानिक अनुशासन,
'नाट्यशास्त्र' में कला
और सौंदर्यबोध का विवेचन
तथा कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में
राज्यव्यवस्था,अर्थनीति,
कूटनीति और न्याय का
गहन चिंतन मिलता है।
आर्यभट्ट,ब्रह्मगुप्त
और भास्कराचार्य के गणित
एवं खगोल सँबंधी कार्य,
'मयमतम्' की नगर नियोजन
और स्थापत्य-दृष्टि
तथा 'चरक सँहिता'
और 'सुश्रुत सँहिता' की
चिकित्सा-परंपरा
इस ज्ञान-विस्तार को
और व्यापक बनाती है।
जैन और बौद्ध परंपरा भी
सँस्कृत साहित्य की
इसी बहुलतापूर्ण विरासत का
अविभाजित हिस्सा है।
सँस्कृत-साहित्य
जीवन को समझने
और अधिक सार्थक बनाने वाली
ज्ञान-सँपदा है।
(सँस्कृत के प्रति सम्मान
और प्रचार-प्रसार को समर्पित)
✒️मनोज श्रीवास्तव

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