प्रकृति-शुभेषु भारतीयता
विश्व पर्यावरण दिवस पर,
प्रकृति-शुभेषु भारतीयता
@मानव
भारतीय सँस्कृति पृथ्वी को
केवल भौतिक सँसाधन नहीं
वरन माँ के रूप में पूजती है,
अतः पर्यावरण सँरक्षण
हमारी परंपरा
और जीवन-पद्धति का अङ्ग है।
पर्यावरण सँरक्षण का दृष्टिकोण
सामाजिक,धार्मिक
और नैतिक मूल्यों से भी
गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रकृति के साथ हमारी
एक टिकाऊ
तथा संतुलित संबंध हैं
जिसकी भावना लोगों के
सँस्कारों और जीवनशैली में
रची-बसी है,
जिसे वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी
निभाते चले आ रहे हैं।
जँगल,पृथ्वी,आकाश,
जल,वायु और अग्नि जैसे
प्राकृतिक तत्व हमारी
सभ्यता,सँस्कृति
और जीवन-दर्शन का
अभिन्न अङ्ग हैं।
उगते हुए सूर्य,
प्रभात की लालिमा,
प्रकृति की निस्तब्धता
और उसकी मधुरता का
सुंदर और सँवेदनशील चित्रण
वेदों में उपलब्ध है।
वेदों में जीवन और प्रकृति
एक-दूसरे से गहराई से
जुड़े हुए माने गए हैं;
वहाँ प्रकृति भौतिक सँसाधन नहीं,
बल्कि जीवन की सहचरी
और प्रेरणा-शक्ति के रूप में
प्रस्तुत की गई है।
अनुष्ठानों में शाँति मंत्र पाठ का
मूल स्रोत वेद हैं;
जिनमें समस्त सृष्टि के लिए
शाँति,सँतुलन
और कल्याण की कामना है;
अंत में यह कामना की गई है
कि वही शाँति हमारे भीतर भी
स्थापित हो।
सभी प्राकृतिक शक्तियों
और सृष्टि के विभिन्न
घटकों के बीच
समन्वय,सँतुलन
और सद्भाव की भी भावना
इन मंत्रों में निहित हैं।
भारतीय परंपराओं में निहित
पर्यावरणीय दृष्टिकोण
मानवता को प्रकृति के साथ
सँतुलित और सतत जीवन जीने की
महत्वपूर्ण सीख देता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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