आत्मज्ञान का श्रावण
आत्मज्ञान का श्रावण
@मानव
सनातन धर्म-सँस्कृति में
श्रावण मास ऋतु ही नहीं,
अपितु आत्मशुद्धि,तप,सँयम
व शिवतत्त्व के साक्षात्कार का
दिव्य अवसर है।
भगवान शिव
देवाधिदेव ही नहीं,
परम चैतन्य,
ज्ञान,
वैराग्य,
करुणा
और समत्व के
मूर्त स्वरूप भी हैं।
शास्त्र प्रार्थना करते हैं,
उस शिव को नमस्कार,
जो स्वयं कल्याणस्वरूप हैं
और समस्त जगत को
कल्याण प्रदान करने वाले हैं।
'नमः शिवाय च शिवतराय च'
शिव की महिमा का पूर्ण वर्णन
परम विद्वान भी नहीं कर सकते;
'महिम्नः पारं ते
परमविदुषो यद्यसदृशी'
(शिवमहिम्नः स्तोत्र)
शिव का अर्थ ही है,कल्याण;
शिवत्व वह परम अवस्था है,
जहाँ अहंकार का विसर्जन,
करुणा का उदय
और आत्मा का ब्रह्म से
अभेद बोध होता है।
अज्ञान समस्त दुखों का मूल है;
भय,मोह,विषाद
और असंतुलन
उसी की अभिव्यक्तियां हैं;
इसलिए वेद प्रार्थना करता है,
'त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्'।
यह महामृत्युंजय मंत्र
केवल आयु वृद्धि का नहीं,
बल्कि मृत्यु स्वरूप
अज्ञान,भय और बंधनों से
मुक्ति का महामन्त्र है।
समुद्रमंथन की कथा
मानव अंतःकरण का
दार्शनिक रूपक है;
मन में अमृत भी है
व हलाहल भी।
शिव-विषपान,शिक्षा देता है
कि सज्जन पुरुष
सँसार के विष को
स्वयं धारण कर
लोकमंगल का मार्ग
प्रशस्त करते हैं।
उनके कण्ठ का नीलवर्ण
त्याग,धैर्य,सहिष्णुता का
शाश्वत प्रतीक है;
नंदी धर्म और पुरुषार्थ का,
जटाओं से प्रवहमान गङ्गा
ज्ञानधारा का,
मस्तक का चंद्र
शीतल विवेक का
व तृतीय नेत्र आत्मबोध
एवं अविद्या दहन का प्रतीक है।
(स्वामी अवधेशानंद गिरि के लेख से प्रेरित)
✒️मनोज श्रीवास्तव

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