शिवोऽहम्

 शिवोऽहम्


           @मानव

जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था,

दिन था न रात्रि,

सत था न असत,

तब केवल निर्विकार शिव ही थे।


शिव आदि देव हैं;

शिव महादेव हैं;



ऋग्वेद में भगवान शिव को

रुद्र कहा गया है;

पुराणों में वे

महादेव के रूप में स्वीकार्य हैं।


शिव ही दाता हैं

और भोक्ता भी शिव ही हैं;

शिव का अर्थ है आनंद,

परम मंगल

और परम कल्याण।


ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं 

विष्णु पालक हैं

और शिव सँहारक हैं

पर मूलरूप से शक्ति एक ही है,

जो तीन अलग-अलग रूपों में

अलग-अलग कार्य करती है।

वह मूल शक्ति शिव ही हैं।

ब्रह्मा,विष्णु व शंकर की उत्पत्ति

माहेश्वर अँश से ही होती है।

   (स्कंद पुराण)


सृष्टि का आदि कारण शिव ही हैं,

इस ब्रह्माण्ड व्यवस्था में 

परमात्मा के पारमार्थिक 

आनंदमय स्वरूप को 

प्रकट करने वाली शक्ति को

हम विद्या व अविद्या

कह सकते हैं।


सृष्टि का अनादि तत्व

शिव ही हैं;

वही कारण हैं

सृष्टि,स्थिति और प्रलय का;

उन्हीं शिव का स्वरूप 

ज्योतिर्लिंग के रूप में है। 


इस ज्योतिर्लिंग में ही 

सब-कुछ समाहित है;

शिवलिङ्ग की जलहरी 

ब्रह्माण्ड का स्वरूप है;

सँपूर्ण ब्रह्माण्ड ही

शिव का स्वरूप है।


शिव को जानने का अर्थ 

किसी व्यक्ति को जानना नहीं,

बल्कि अपने भीतर की 

परम चेतना

व आनंद (शिवत्व) का 

अनुभव करना है।


शिव साकार आकृति मात्र नहीं हैं,

बल्कि वे एक अनंत तत्व हैं,

जो हर जीव के भीतर 

'आत्मा' के रूप में मौजूद हैं।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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