स्वयँ का अनुशासन है स्वाधीनता
स्वयँ का अनुशासन है स्वाधीनता
@मानव
स्वाधीनता का सच्चा अर्थ
स्वयं के अधीन
यानी अपने अनुशासन
और व्यवस्था में जीना है।
स्वतँत्रता
केवल अधिकारों का
उपयोग करना नहीं है,
बल्कि अधिकारों के साथ
अपने कर्तव्यों का
पालन करना भी है।
स्वाधीनता में
सबसे महत्वपूर्ण
स्वयं का अनुशासन है,
स्वतँत्रता का अर्थ है
स्वयं के तंत्र में रहना,
न कि किसी बाहरी
या विकृत व्यवस्था के
अधीन होना।
अपने तँत्र में रहना
तभी सार्थक है,
जब हमें अपने कर्तव्यों का
बोध भी हो।
नागरिक कर्तव्यों का
पालन करना भी
उतना ही आवश्यक है,
जितना नागरिक अधिकारों को
जानना और माँगना।
जिसने कभी परतँत्रता का
कष्ट झेला हो,
वही स्वाधीनता की
असली कीमत
और उसकी पवित्रता को
गहराई से अनुभव कर सकता है।
पराधीन व्यक्ति कभी भी
सुख का अनुभव
नहीं कर सकता है,
पराधीनता एक तरह का
अभिशाप होती है।
मानव ही नहीं,
पशु-पक्षी भी पराधीनता में
सुखी नहीं रह पाते,
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।
(श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड)
व्यक्ति की प्रसन्नता के लिए
सबसे आवश्यक है
मन की है स्वाधीनता,
जब पराधीन पशु-पक्षी भी
खुश नहीं रह सकते
तो पराधीन मन
कैसे खुश रह सकता है?
स्वाधीन मन वह है,
जो संशय से मुक्त है,
अंधेरों से मुक्त है,
जो नकारात्मक विचारों से मुक्त है।
स्वाधीनता के लिए
निर्भीकता अच्छी है,
लेकिन निरंकुशता को
सही नहीं ठहराया जा सकता।
स्वाधीनता के लिए
व्यवस्था ऐसी हो,
जो किसी दूसरे को
अव्यवस्थित न कर दे;
यह व्यवस्था
आत्म नियंत्रण
और आत्म-साक्षात्कार से भी
जुड़ी होनी चाहिए।
यह बात व्यक्तिगत रूप से भी,
पारिवारिक रूप से भी
और समाज व राष्ट्र के स्तर पर भी
लागू होती है।
स्वाधीन राष्ट्र वह है,
जिसके पास सृजन शक्ति हो;
राजनीतिक स्वतंत्रता तब है,
जब देशवासियों में
एकता बनी रहे।
जिस मन में सत्य है,
प्रेम है,
करुणा है,
उसमें स्वाधीनता के गुण
स्वतः आ जाते हैं;
यह आध्यात्मिक दृष्टि है।
आध्यात्मिक स्वतँत्रता तब है,
जब व्यक्ति अपने
अहंकार से मुक्त हो जाता है
और भगवान के प्रति
समर्पण करता है।
स्वाधीनता में व्यवस्था
समदर्शन वाली ही होनी चाहिए,
स्वाधीनता का उपयोग
इस प्रकार हो
कि किसी के भी साथ
विषमता न की जाए
और न ही होने दी जाए।
स्वतँत्रता अगर शौर्य का परिणाम है
तो यह संयम और धैर्य
व शौर्य का भी प्रतीक है;
स्वाधीनता की सार्थकता तभी है,
जब शौर्य के साथ-साथ
धैर्य और सँयम भी हो।
अच्छा समय हो तो भी सँयम,
बुरा समय हो तो भी संयम।
असली स्वतँत्रता तो वह है
कि हम सत्य,अहिंसा
और प्रेम की राह पर चलें,
लेकिन आवश्यकता पड़ने पर
प्रहार और प्रतिकार करने की
क्षमता भी हमारे हाथ में हो।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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