हिन्दी दिवस (लघु कथा)
लघु कथा
हिन्दी दिवस
@मानव
साहब के चैम्बर से निकलती सहकर्मी मैडम नीति को अपनी सीट पर तेजी से जाता देख मैने पूँछ ही लिया -"क्या बात है मैडम? "
"आज 14 सितम्बर है न! " वे तपाक से बोलीं|"साहब ने हिन्दी दिवस पर एक मीटिंग अरेंज करने की नोटिस निकालने के लिए बोला है |"
मैं सोचने लगा- साल भर अंग्रेजी लैंग्वेज वाले कम्प्यूटर पर काम करते-करते चलो इसी बहाने आज एक दिन हिन्दी को याद तो कर लिया जाएगा | पिछले साल तो कानवेन्टी साहब ने हिंग्लिश में हिन्दी के पुनरुत्थान के लिए एक लंबा सा लेक्चर पिलाया था | फिर भी एक सज्जन हरदेव प्रसाद बाहरी आदि को पढ़ कर आए थे और बढ़िया बोले भी |एक ने निशंक जी की कविता सस्वर सुनाई थी तो एक ने स्वरचना भी पढ़ी थी | पर इस बार तो कार्यक्रम को मनाने की पूर्व सूचना भी नहीं दी गई थी | फिर भी मैं कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अपने पुराने विचार व अध्ययन कुरेदने लगा और धीरे - धीरे अपने काम में लग गया |
शाम चपरासी खुला नोटिस रजिस्टर लिए आया और सामने रख कर बोला - "साहब साइन कर दीजिए |" मैने नोटिस पढ़ी, चौंका, सामने की दीवार घड़ी देखी, दिग्भ्रमित सा हो कलाई घड़ी पर नजर डाली |हैरान होकर पूँछा - "नोटिस के हिसाब से कार्यक्रम तीन बजे होना है और इस समय तो साढ़े चार बज रहे हैं |" वह मुस्कराया - हॉ साहब! पर बड़े साहब ने कहा है सबसे साइन करा लो |हिन्दी दिवस पर मिठाई भी आ गई है |
साहब का आदेश था |'यस-बॉस' का अंदाज़ मजबूरी थी क्योंकि मुझे हिन्दी के पुनरुत्थान कीअपेक्षा अपने भविष्य का पुनरुत्थान अधिक महत्वपूर्ण नजर आ रहा था | मैंने हस्ताक्षर कर दिए | मिठाई का खुला डिब्बा लिए दूसरा चपरासी आ गया था | उसने डिब्बा सामने किया |यंत्रचलित सा मैं मिठाई की एक पीस उठा कर खाने लगा |पानी पीकर काम बंद किया और पॉच बजते-बजते घर के लिए निकल पड़ा | अगले दिन आफिस पहुँचा तो बजट-कंट्रोल रजिस्टर सामने था जिसमें लगा बिल झॉक रहा था | मैने रजिस्टर पलटा | कल आई दो किलो मिठाई के बदले में हिन्दी -दिवस के उपलक्ष्य में आए पूरे बजट का सूपड़ा साफ था जिसे मुझे सत्यापित करना था | आखिर हिन्दी का पुनरोदय जो होना था..... |
(......यथा अनुभूत. 14.09.2005...)
मनोज
सुलतानपुर

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