विवेकपूर्ण जीवन ही गणेश पूजा
विवेकपूर्ण जीवन ही गणेश पूजा
@मानव
गणेशजी विनय
और विवेक के देवता हैं,
व्यक्ति के जीवन में
विनय और विवेक बना रहे,
यही गणेश पूजा है।
कोई धर्म विवेक को
अस्वीकार नहीं कर सकता,
विवेकपूर्ण होना ही
गणेश पूजा है।
विवेक से नाक बढ़ेगी,
यानी प्रतिष्ठा बढ़ेगी;
विवेक सारभौम सूत्र है;
यह जगत कल्याण,
मानव कल्याण का सूत्र है।
गणेशजी को मोदक पसंद हैं;
मोद का का अर्थ है आनंद;
कः का अर्थ है 'छोटा अंश';
आध्यात्मिक रूप से यह
ज्ञान,मोक्ष और परमानंद का प्रतीक है।
हाथ में पकड़ा हुआ मोदक
इस बात का प्रतीक है
कि गणेशजी के पास
अपने भक्तों को
आनन्द प्रदान करने की क्षमता है;
जहाँ विवेक होता है,
वहाँ आनंद आ ही जाता है।
विवेक सही और गलत की
पहचान करवाता है;
विवेकपूर्ण निर्णय लेकर जब व्यक्ति
सही मार्ग पर चलता है
तो बाधाओं से भी बच जाता है।
इसीलिए विवेक रूपी गणेशजी को
विघ्नहर्ता 'बताया गया है;
क्योंकि विवेक में विघ्न को
हरने की क्षमता होती है।
मोद यानी सहज आनंद पाने में
तीन चीजें बाधक हैं
ईर्ष्या,निंदा और द्वेष;
विवेक हमें समझ देता है
कि इनकी कोई जरूरत नहीं है।
विवेक कहता है कि ईर्ष्या की जगह
सामने वाले के लिए
शुभ की इच्छा क्यों न करें?
निंदा की जगह
निदान क्यों न करें ?
जीवन से तीन सूत्र जुड़े हैं-
कर्म, विश्वास और संबंध;
जीवन के तीनों पहलुओं पर
बिना विवेक के नहीं चलना चाहिए।
विवेक हमें सदा सावधान रखता है
अमृत-विष,
कुसंग-सत्संग के बीच
हमें सचेत रखता है।
विपत्तिकाल में सब मित्र
और परिचित साथ छोड़ सकते हैं,
पर विवेक साथ बना रहेगा;
उस स्थिति में किसी से
बदले की भावना मन में न रहे,
उसी का नाम विवेक है।
विवेक कोई भौतिक वस्तु नहीं है,
विवेक सत्संग से आता है
बिनु सतसंग बिबेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।
(श्रीरामचरितमानस)
विवेक हमारा भीतरी मित्र है;
विवेक सत्संग से प्राप्त होता है;
सत्संग के रस विवेक को
यदि हम व्यवहार में न लाएं
तो कुछ हासिल नहीं होगा।
यह विवेक ही असमय का सखा है।
विवेक हमें शुभ-लाभ बताता है
प्रत्येक लाभ शुभ हो,
यह आवश्यक नहीं है,
लेकिन प्रत्येक शुभ लाभकारी ही है;
इसलिए लाभ से पहले
शुभ की कामना हो।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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