अपराजेय उपलब्धि
राजभाषा दिवस पर,
अपराजेय उपलब्धि
@मानव
किसी भाषा की प्रतिष्ठा
तब उत्कर्ष पर पहुँचती है,
जब उसके शब्दों को
सँसार तक पहुँचाने के लिए
अनुवाद की बैसाखी की
आवश्यकता नहीं होती।
भाषा का मतलब
सिर्फ जीभ नहीं है,
भाषा हमारा मन और माथा है
साथ में स्वाभिमान भी!
चाहे सैन्य अभियान हो
या रक्षा उत्पाद
अंतरिक्ष की उड़ान हो
या चंद्रयान से प्रज्ञान
हर जगह गुंजायमान हो रही है
हिंदी की पदचाप!
राष्ट्र अपनी उपलब्धियों को
जब अपने शब्द देता है
तब सँसार उन्हीं शब्दों में
उन्हें पहचानने लगता है।
अग्नि से आकाश तक,
तेजस से अरिहंत
और मेघदूत से सिंदूर तक;
आधुनिक भारत के
विज्ञान अनुसन्धान,
सूचना प्रौद्योगिकी,
सैन्य कार्यवाही,
रक्षा उपलब्धियों में
हर जगह हर प्रकार से
दीप्त हो रही है अपनी भाषा!
इन परिचित शब्दों में
निजी वेदना,
सामाजिक सँवेदना
और राष्ट्रीय प्रत्युत्तर
एक साथ ध्वनित हुए हैं;
जिनका अर्थ देश को
समझाना नहीं पड़ा।
साँस्कृतिक शब्द की
यही शक्ति है;
कोश उसका अर्थ
कुछ पँक्तियों में बता सकता है,
किंतु समाज उसमें सदियों का
अनुभव सँचित करता है।
नामकरण भी
साँस्कृतिक संप्रभुता है;
मनुष्य जिसे खोजता,रचता
या निर्मित करता है,
उसे अपनी भाषा में
पहचान भी देता है।
राष्ट्रों के संदर्भ में
यह प्रक्रिया गहरा अर्थ
ग्रहण करती है;
अपनी अत्याधुनिक
वैज्ञानिक और सामरिक
उपलब्धियों के नाम
भाषिक-साँस्कृतिक निधि से चुनना
सभ्यतागत आत्मविश्वास का
दिव्य सूचक है।
प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर राष्ट्र
अपनी उपलब्धियों के नाम भी
जब स्वयं गढ़ता है,
तो वह केवल वस्तु का
निर्माण नहीं करता;
उसके बारे में सँसार
किस शब्द से बात करेगा,
यह भी तय करता है!
यही हमारी भाषा की
अपराजेय उपलब्धि है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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