सृजन का उत्सव
दुर्गा पूजा पर,
सृजन का उत्सव
@मानव
कहीं ढोलों की थाप
मन में उमंग भर रही है
तो कहीं शंख की ध्वनि
वातावरण में एक अलग ही
भाव जगा रही है।
दुर्गा पूजा का उल्लास
हर ओर छाया है;
यह केवल आस्था का
अवसर नहीं,
सृजन को नए अर्थ
देने का भी समय है।
कोई माँ की निर्भीकता से
प्रेरणा लेता है
तो कोई उनके रूपों में
जीवन के रङ्ग उकेरता है;
देवी दुर्गा कलाकारों की
सृजन यात्रा में शामिल हैं।
दुर्गापूजा
पूजा को स्त्रीशक्ति के
उत्सव के तौर पर है;
निर्भीकता, लगन
और वह शक्ति
जो देवी दुर्गा का प्रतीक है।
माँ जिस महिषासुर का
दमन करती हैं,
वह केवल दानव नहीं है;
वह जीवन की वही बाधा है,
जो हर व्यक्ति के जीवन में आती है।
एक कलाकार के लिए सृजन
केवल किसी कलाकृति को
आकार देना नहीं,
बल्कि अपने भावों
और कल्पनाओं को
अभिव्यक्त करना है।
कभी कोई आकृति
तो कभी कलात्मक रचना
मन के अनकहे भावों को
सामने ले आती है।
दुर्गा पूजा पर
देवी के विविध रूप,
उनकी दृढ़ता,
चेहरे का तेज
और महिषासुर पर विजय की कथा
कलाकारों की सृजनशीलता को
नई दिशा दे रही है।
स्त्री शक्ति को अभिव्यक्त करने की
सृजनात्मक यात्रा में
स्त्री ऊर्जा परिवर्तनशील है,
जिसे किसी एक रूप में
समाहित नहीं किया जा सकता।
इसी असीम ऊर्जा को
विभिन्न प्रतीकात्मक
और पौराणिक रूप में
अपनी कला में उतारकर
हम सृजन का उत्सव मनाते हैं।
✍️मनोज श्रीवास्तव
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