शक्ति की भक्ति
शक्ति की भक्ति
@मानव
एक शक्ति है,
जो सर्वत्र व्याप्त है;
वह शक्ति अनेक रूपों में
कण-कण में विद्यमान है;
वही समस्त सृष्टि की रचयिता है
और सँहारक भी।
प्रकृति ने माया का रूप
समय के अनुसार भिन्न बनाया है;
माया उसी शक्ति का प्रमाण है,
पर उसे जानने,समझने,
अनुभव करने से
मानव में चेतना
मुखर होती है।
शक्ति की उपासना
कोई कर्मकांड नहीं है;
वरन् शक्ति की पूजा-अर्चना
मायातीत ऊर्ध्व चेतना को
जागृत करने में समर्थ है।
जीव के लिए विचार
और सँकल्प द्वारा
मनोबल की यात्रा पूर्ण करना
एकमात्र लक्ष्य है;
तभी हमारी एक-एक श्वास पर
शक्ति का नियंत्रण है।
विभिन्न रूपों
और क्षितिज आयामों में
शक्ति का स्फुरण
नारायण की इच्छा के अधीन है;
हरि की इच्छा
शक्ति का प्रवाह है।
प्रभु अपनी शक्ति रूपेण देवी का
आश्रय लेकर विराम लेते हैं;
वे सब कुछ देवी माँ को सौंप कर
निश्चिंत हो जाते हैं।
देवी का प्राकट्य
हर सँकट,बाधा,पाप, अत्याचार
और अन्याय को
मिटाने के लिए होता है।
शक्ति का भौतिक नाम शाँति है;
शाँति ही देवी है;
माँ शाँति की कृपा हो तो मानव
अपार शक्ति का
भाजक बन सकता है।
लोकों का कल्याण
शाँति की मर्यादा से
सभी दिशाओं में गतिमान है;
अपनी ही आत्मा के दिव्य दर्शन,
चेतना के प्रकाश में
मातृशक्ति का आह्वान है;
तभी,शरीर की गति और मति
दोनों समर्पित भाव से पुकारती हैं
या देवी सर्वभूतेषु
शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नमः॥
(श्रीदुर्गा सप्तशती)
(जो देवी समस्त प्राणियों में
शक्ति,चेतना
और सामर्थ्य के रूप में स्थित हैं,
उन भगवती आदिशक्ति को
बारंबार नमस्कार है,
कोटिशः नमन है।)
✒️मनोज श्रीवास्तव

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