असल धन
धनतेरस पर,
असल धन
@मानव
धन त्रयोदशी मात्र
आर्थिक समृद्धि का ही पर्व नहीं,
यह आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है।
हमारे ऋषियों ने
जीवन,स्वास्थ्य,प्रकृति,
प्राण ऊर्जा आदि को
वास्तविक धन बताया है।
यद्यपि धन त्रयोदशी
आर्थिक समृद्धि का
द्योतक है
किंतु वैदिक ज्ञान में धन
व्यापक और अनूठा है।
हमारा उत्साह और तेज भी धन है।
प्रकृति से मिलने वाली वायु
और सूर्य का प्रकाश
अमूल्य संपदा है।
जीवन भी धन है।
जीवन की शक्ति या प्राण ऊर्जा,
जिसे वसु भी कहा गया है,
वह भी धन है।
जब यह बोध जाग्रत होता हैं
कि जीवन ही वास्तविक धन है
तो मन में धन्यभागी होने का
भाव उदित होता है।
जीवन के प्रति
और जो कुछ हमें प्रकृति से प्राप्त है
उसके प्रति कृतज्ञ होना ही
वास्तविक धन है।
जो जीवन के प्रति
धन्यवाद का भाव रखते हैं,
प्राप्ति के प्रति कृतज्ञ होते हैं,
वे अधिक समृद्ध होने की
पात्रता प्राप्त करते हैं।
धन्यभागी या कृतज्ञ होना ही
सच्चा धन है।
अपनी अर्जित धन-संपदा की
धन तेरस पर पूजा की परंपरा
हमें अपनी उपलब्धियों
और संसाधनों का
सम्मान करना सिखाती है।
उसके प्रति कृतज्ञ होने से
अभांव की भावना कम होती है
और लोभ के स्थान पर
संतोष का भाव विकसित होता है।
जब जीवन में बोध
और ज्ञान रूपी दीपक
प्रकाशित होता है
तो तृप्ति का भाव जाग्रत होता है
और लोभ व दरिद्रता का
अंधकार मिट जाता है।
अभाव की भावना से
प्रेरित होकर कार्य करने
तथा प्रचुरता व संतोष के
भाव के साथ
कार्य करने के अंतर को
स्मरण रखना आवश्यक है।
धनतेरस धन और स्वास्थ्य के बीच
संतुलन स्थापित करने का
संदेश देता है।
इस पर्व खरीदारी को
सामर्थ्य और श्रद्धा से
जोड़कर देख गया है।
धनतेरस की शाम
घर के मुख्य द्वार,खिड़की,छत,
तुलसी के पौधे,रसोई,आंगन आदि में
दीये रखने का उद्देश्य
घर के प्रत्येक कोने में
प्रकाश और सकारात्मकता का
संचार करना है।
धनतेरस हमें सिखाता है
कि धन,स्वास्थ्य और सुख-शांति
एक दूसरे के पूरक हैं;
इनमें से किसी एक की
उपेक्षा करके जीवन को
पूर्ण नहीं बनाया जा सकता।
जीवन का रसपूर्ण होना भी धन है;
हमारी आत्मचैतन्य सत्ता
जीवन के सभी रसों का
मूल स्रोत है;
उस मूल स्रोत तक
पहुंचने का मार्ग अध्यात्म है।
जब हम अध्यात्म को
अपने जीवन का आधार बनाते हैं
तो अन्य सभी संपत्ति व योग्यताएं
सहजता से प्राप्त होने लगती हैं।
✍️ मनोज श्रीवास्तव

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