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Showing posts from March, 2025

विक्रम की विजय ध्वजा

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  विक्रम की विजय ध्वजा             @मानव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा  विक्रम संवत् के आरंभ होने का दिन है, विश्व के सबसे पहले गणतंत्र का स्थापना दिवस होने के साथ-साथ सृष्टि के आरंभ का भी दिन है। अब से 2082 वर्ष पहले  शकों को परास्त कर मालव गणराज्य की जो अविस्मरणीय जीत हुई,  उसे राष्ट्रीय गौरव का विषय मानकर  घर-घर, द्वार-द्वार गुड़ी बाँधने की परंपरा के कारण यह गुड़ी पड़वा का भी दिन है। गुड़ी विजयोल्लास की देवी है, नए सँवत्सर की  शुभ-संदेशवाहिका है; यह नव-संवत्सर की  सनातन उषा ही है जो हमारे द्वार पर उत्सव बनकर आ खड़ी होती है। विक्रम सँवत् सूर्य-गति पर नहीं, चंद्रमा की कलाओं पर निर्भर है; कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के एक-एक दिन के कलात्मक सौंदर्य के जादू से  हम सब परिचित हैं। विक्रम सँवत् के अनुशासन से बंधे हैं हमारे आचार-विचार! इसके मास,पक्ष और तिथियों का अधूरा ज्ञान होने के बावजूद नई और पुरानी पीढ़ी विक्रम संवत् के साथ दिल से जुड़ी हैं, क्योंकि हमारे धार्मिक रीति-रिवाज,  जन्म-विवाह-मृत्यु से संबंधित सामाजिक व्यवहार,पर्व...

शक्ति उपासना

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  शक्ति उपासना                @मानव मनुष्य चेतना शक्ति के रूप में जीवन जीता है, मन होने के कारण ही मानव मनुष्य कहलाता है,  जो अन्य जीवों को नहीं मिलती। जो मन को सशक्त नहीं बनाते, वे संसार में बोझ बनकर रहते हैं और मनुष्य रूप में भी  पशुओं की तरह जीते हैं।    ( चाणक्य नीति ) व्रत-उपवास के लिए चैत्र नवरात्र उपयुक्त है; सामान्य रूप से ऋतु परिवर्तन के समय व्रत-उपवास के जरिये  ब्रह्माण्ड में व्याप्त शक्तियों को संचित करने का विधान है।  नवरात्रि के दौरान चेतना शक्ति,बुद्धि,निद्रा, शाँति,काँति,लक्ष्मी,स्मृति  तथा मातृ शक्ति आदि  अनेकानेक शक्तियों की  कृपा की कामना की जाती है। शक्ति कृपा प्राप्त कर मनुष्य  आत्मा एवं मन की शक्ति से  परिपूर्ण होता है; मन यदि कमजोर होता है तो भौतिक शक्तियाँ व्यर्थ लगती हैं। अतः नवरात्र पर्व पर पूरे विधि-विधान से व्रत प्रकृति रूपी दुर्गा से शक्ति अर्जित करने का प्रयास है।   ✒️मनोज श्रीवास्तव

नव सँवत्सर

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  नव सँवत्सर           @मानव नव संवत्सर के प्रवेश से नूतनता का चतुर्दिक प्रसार  दृष्टिगोचर हो रहा है;  रस-राग और सुगंध से भरी प्रकृति में तितलियाँ,भ्रमर और कोयलें  अपने उन्मुक्त उल्लास के द्वारा समृद्धि का सँकेत कर रहे हैं। भारत इस अर्थ में विलक्षण है यहाँ वर्ष का नवीकरण मात्र आँकिक गणनाओं के  अधीन नहीं, अपितु संपूर्ण पर्यावरण  व नवीनता को अंगीकार कर  नए संवत्सर के आगमन का  उत्सव मनाता प्रतीत होता है। पारंपरिक रूप से  भारत में नव वर्ष में ऋतुएं बसती हैं, उसे संवत्सर कहते हैं; सँवत्सर शब्द का अर्थ  इसकी अंत:क्रिया को व्यक्त करता इसकी चरितार्थता को भी  स्पष्ट करता है। सँवत्सर के प्रथम ऋतु के रूप में वसंत का आगमन होता है;  वसंत ऋतु के चैत्र और वैशाख महीने हैं, जिन्हें क्रमशः मधुमास और माधवमास कहा जाता है- ‘वसंतौ मधुमाधवौ’। यह मधुऋतु है, मधु अर्थात जीवन का सत्त्व; इसी से जीवन की गति है; इसी मधु की न्यूनता, इसका सूख जाना शिशिर ऋतु के रूप में  दिखाई पड़ता है। पत्ते वृक्षों से गिर जाते हैं, वनस्पतियाँ अपन...

शीतला सप्तमी

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  शीतला सप्तमी              @मानव      माता शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं, उनकी उपासना स्वच्छता  और पर्यावरण सुरक्षा की प्रेरणा देने के कारण सर्वथा प्रासंगिक है। शीत-ग्रीष्म के सन्धिकाल में जब हम संक्रमण और बीमारियों से बचने के लिए अधिक सावधान रहते हैं, माता शीतला का संदेश हमें अपने आसपास की  स्वच्छता बनाए रखने और पर्यावरण का ध्यान रखना आवश्यक बताता है; वे हमारे जीवन में स्वच्छता और स्वास्थ्य का सन्देश देती हैं। माता शीतला का वाहन गर्दभ है; वे अपने हाथों में कलश,  सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं।   ( स्कंद पुराण ) सँक्रामक रोगों में नीम के पत्ते उपयोगी हैं तो सूप और झाड़ू स्वच्छता का प्रतीक हैं। मान्यता है कि शीतला देवी के आशीर्वाद से परिवार में रोगों का निवारण होता है। इनकी अर्चना का स्तोत्र स्कंद पुराण में शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा का  गान करता है और उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है; मान्यता है कि इसकी रचना  भगवान शंकर ने की थी।  माता शीतला की पूजा का ...

प्रेम रङ्ग हो ली

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  प्रेम रङ्ग हो ली               @मानव भारतीय पर्वों-त्योहारों में  राधा-कृष्ण शाश्वत मिथक के रूप में व्याप्त हैं; राधा-कृष्ण की यह अवधारणा होली पर्व के माध्यम से  अनेक स्तरों पर भारतीय सँस्कारों में रिसती रहती है। होली अभिसार-क्षणों की  वह एकात्मक और एकाँतिक अन्विति है,  जिसमें स्थूलता, रङ्गों की सूक्ष्मता द्वारा  रूपायित होती है। माँसलता और दैहिक गंध की समाप्ति के आगे की यह यात्रा होती है,  जिसमें गाँव की किशोरी किशोर की, राधा कृष्ण की हो ली; आत्मा परमात्मा की हो ली  और यह धरती,सूर्य की हो ली। राधा-कृष्ण की होली तो  जग-जाहिर है; ब्रज की गलियों में होली की आकुलता से  तंतु-तंतु सराबोर हो जाता है। कृष्ण-प्रिया राधा अपने स्वरूप की सार्थकता ही कृष्ण की प्रीत के रङ्ग से  प्राप्त करती है। आत्मा-परमात्मा के बीच की होली तो अध्यात्म और दर्शन की  गलियों से गुजरती हुई  ब्रजमण्डल (ब्रह्माण्ड) में  समाप्त होती है। जहाँ ब्रह्मरंध्र रूपी पिचकारी से अमृतरूपी रङ्ग टपकता है  और आत्मा पूर्णरूपेण ...

होली के रङ्ग

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  होली के रङ्ग                   @मानव होली मात्र एक पर्व न होकर  जीवन के विविध रंगों का दर्पण है; यह ऋतु परिवर्तन का उल्लास है; हृदय के विकारों का दहन  और आत्मीयता के रंग-रस से अभिसिंचित अभिव्यक्ति है।  जब प्रकृति नवपल्लवों से  सुसज्जित होती है, जब पुष्प अपनी सुगंध से  वायुमण्डल को सुरभित करते हैं, तब यह रँगोत्सव मानो सजीव हो उठता है।  होली का प्रमुख आकर्षण  इसके रङ्ग हैं, जो सामाजिक भेदभाव को  तिरोहित कर देते हैं; इस दिन सब एक होते हैं  कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई पराया नहीं। गुलाल के हल्के फाहों से  आरंभ हुआ यह उत्सव जब चटकीले रङ्गों में परिणत होता है, तब मानव मन की संकीर्णताएं भी धुल जाती हैं; हर मन प्रफुल्लित हो उठता है। होली में केवल रङ्ग ही नहीं,  अपितु आध्यात्मिक सँदेश भी है; यह असत्य पर सत्य की  विजय का प्रतीक है, भक्ति की अडिंगता का साक्षी है। प्रह्लाद की निर्भय भक्ति और होलिका की चिता हमें यह सिखाती है कि कितनी भी बाधाएँ आएँ, किंतु सत्य की लौ अक्षुण्ण रहती है। जीवन भी एक रङ...

रङ्ग की ओर

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रङ्ग की ओर               @मानव हमारे त्योहार सिर्फ देखकर आनंद उठाने के लिए नहीं बल्कि उसमें बराबरी से भाग लेकर  समरस होने के लिए होते हैं। भारतीय संस्कृति में त्योहार  हमारे सामाजिक जीवन में  ऊर्जा का सँचरण करने में  उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं। हमारी सँस्कृति में त्योहार का अर्थ है सबके साथ उत्सव की  खुशियाँ बाँटना; जो समर्थ हैं उनके साथ  अपने सुख-दुख साझा करना और जो समर्थ नहीं हैं, उन्हें सहारा देकर उनके जीवन का उल्लास बढ़ाना। फागुन के महीने को रङ्गों से सराबोर करता होली का त्योहार अपनी बहुरंगी आभा और विविधवर्णी मादकता से पूरे वातावरण को उल्लासित कर देता है। यह त्योहार जीवन की  उदासीनता और मलिनता को दूर करते हुए ऊर्जा के नए स्फुरण का संचार करता है। पर्व न सिर्फ हमारे दैनंदिन जीवन की एकरसता को भंग करते हैं  बल्कि हमें जीवन जीने की  एक नई प्रेरणा और दृष्टि देते हैं। त्योहारों पर परिवार के  सदस्यों का मिलन, उल्लास और उमंग का वर्णन, इसी की पराकाष्ठा है- होली का त्योहार। कालमान के अनुसार पद्धति बदली, ले...

जीवन का सत्य

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  जीवन का सत्य               @मानव हिरण्यकशिपु पिता है, पिता से ही पुत्र आता है, पुत्र उसी का अँकुर है, हिरण्यकशिपु को पता नहीं  कि मेरे प्राणों से आस्तिकता जन्मेगी। लेकिन प्रह्लाद जन्मा; छोटा-सा अंकुर; उससे हिरण्यकशिपु को डर भी क्या था? लेकिन जीवनभर की  मान्यताएँ-धारणाएँ दाँव पर लग गई होंगी। हर बेटा बाप के विरुद्ध खड़ा होता है; हर आज, कल के विरुद्ध खड़ा होता है; वर्तमान, अतीत से छुटकारे की चेष्टा है; अतीत पिता है, वर्तमान पुत्र है। बीता कल जा चुका, फिर भी उसकी पकड़ गहरी है; हम उससे छूटना चाहते हैं,  पर अतीत हमें पकड़ता है। सँप्रदाय अतीत है, धर्म वर्तमान है; सँप्रदाय यानी हिरण्यकशिपु; धर्म यानी प्रह्लाद; निश्चिततः हिरण्यकशिपु  शक्तिशाली है। प्रह्लाद की सामर्थ्य क्या है?  नया-नया उगा अँकुर है; सारी शक्ति तो अतीत की हैं,  वर्तमान तो ताजा-ताजा है।  पर मजा यही है कि वर्तमान जीतेगा और अतीत हारेगा; क्योंकि वर्तमान जीवंतता है  और अतीत मृत्यु है। हिरण्यकशिपु के पास शक्ति थी, पर शक्ति नहीं जीतती,  जीवन जीतता है।...

महाकुम्भ का सन्देश

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  महाकुम्भ का सन्देश       @मानव धरती पर अमृत कलश  छलकता रहा और उसके अनुभव को मन भर सँजोने की साध के साथ जन समुदाय तत्पर और समर्पित रहा। भारतीयों की दृढ़ आस्था  करोड़ों लोगों को कुम्भ की ओर आकर्षित करती रही और बिना किसी बुलावे के। वहाँ उमड़ता अपार जन समुद्र एक ही आकाँक्षा को लेकर  आगे बढ़ रहा था कि माँ गङ्गा का स्पर्श हो,  उसके छींटे पड़ें और मन तृप्त हो जाए। इस क्षण के लिए लोगों ने  बहुत सारी मुश्किलों का सामना किया पर वे सबकी सब डुबकी लगाते ही झट से लुप्त हो गईं। भारत की साँस्कृतिक  जीवन यात्रा का यह विलक्षण पड़ाव था, भारत के गौरव को प्रतिष्ठित करने वाला यह आयोजन सिद्ध हुआ।  धर्म और आध्यात्म के कई चमकीले और भड़कीले रङ्ग भी दिखे; नागा,अघोरी,शैव,वैष्णव  और विभिन्न मत-मतांतरों का अनुसरण लेने वाले साधु-सँत अंततः आत्मचिंतन और आत्मोन्नयन की ओर ही उन्मुख होने की अपील करते रहे। उपस्थित जनसमूह में  भाषा-भेद भी थे पर सभी आस्था की भाषा से आलोकित हो रहे थे। समूह मन कैसे काम करता है और किस तरह आमजन  अपने-अपने सच को गढ़ते हैं, इस...