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Showing posts from August, 2025

राधा-कृष्ण अभिन्न

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  राधाष्टमी पर, राधा-कृष्ण अभिन्न                  @मानव भारत की आध्यात्मिक भूमि में जो एक शब्द-रस की चिरंतन धारा बनकर प्रवाहित है, वह है ‘राधा’। वेद,पुराण,आगम,स्मृतियाँ,  सर्वत्र राधा नाम का अमृत  सीझा हुआ है; कृष्णोपासना की विराट परंपरा राधा शब्द की उपासना में  स्वयं को चरितार्थ करती है। ‘रा’ का अर्थ है रास और ‘धा’ का अर्थ है धारण; रासोत्सव में श्रीकृष्ण को आनंद की अवस्था में  आलिंगनादि के द्वारा उन्हें धारण करने से राधा शब्द की क्रियसिद्ध होती है। वृंदावनेश्वरी,रसिकेश्वरी और रासेश्वरी के विरुद से  विख्यात पराशक्ति श्रीराधा  समर्पण,अनुराग एवं तत्सुखसुखित्व की परम प्रमाण हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्ण से  सर्वथा अभिन्न हैं; श्रीकृष्ण का सौंदर्य-माधुर्यादि सब श्रीराधाजी की ही छाया है जा तन की झाँईं परी स्यामु हरित दुति होय।      ( भक्तिकवि बिहारीलाल ) नित्य गोलोक धाम में  भगवान श्रीकृष्ण के साथ  एकरस विहार करने वाली श्रीराधा  ‘श्रीदामा के शाप के कारण  उनका श्रीहरि से सौ वर...

गणपति सँदेश

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  गणपति सँदेश            @मानव किसी भी अच्छे काम का  शुभारंभ करना, उसका श्रीगणेश करना है,  क्योंकि गणपति जी को विघ्न विनाशक, दुखहर्ता, सुखकर्ता कहते हैं। सिद्धिविनायक को  सिद्धिदाता कहते हैं; हर शुभ कार्य का आरंभ  उनकी पूजा व स्थापना से करते हैं, कार्य से पहले उन्हें याद करते हैं। जब निराकार परमात्मा शिव  इस पुरानी पतित कलयुगी सृष्टि को नई पावन सतयुगी सँसार में  बदलने हेतु अवतरित होते हैं, तो घोर अज्ञानता व देह अहँकार के कारण  मनुष्य आत्माएँ परमात्मा को पहचान नहीं पाते हैं। परमात्मा शिव हमारे देहाभिमान या देह के अहंकार का सिर काटते हैं, जिससे बाकी सभी विकारों का  नाश हो जाता है।  देहाभिमान ही सभी मनोविकारों की जड़ है, इसलिए परमात्मा शिव उसे काटकर उसकी जगह  प्रज्ञा वाला सिर जोड़ देते हैं  और हम जैसे मानवों को  श्रीगणेश जैसे गुण,शक्ति  और विशेषताओं से सम्पन्न देव बनने का अवसर प्रदान करते हैं। श्री गणेश विशेषताओं से भरे हैं उनके स्वरूप का प्रत्येक अङ्ग हमें सही जीवन निर्माण  और जीवन निर...

राष्ट्रवाद का श्रीगणेश

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  गणेशोत्सव राष्ट्रवाद का श्रीगणेश             @मानव गणपति गणों के स्वामी हैं,  व्रातपति हैं, समूह के देवता हैं, इसलिए समूह से प्यार करते है। वे व्यक्ति की अपेक्षा समूह की गतिविधियों में  रुचि लेते हैं; इसी कारण वे सच्चे लोकदेवता हैं। गणेश जी ज्ञान और विवेक,  बल-बुद्धि, ऋत और सत्य के देवता हैं; एक वही हैं,जो युवाओं के  विशिष्ट नायक होने के कारण ही विनायक कहे जाते हैं।  दक्षिण भारत में गणेश जी  श्रम के देवता माने गए; विश्वास है कि श्रम करने वालों की पीठ पर  गणेश जी अपना हाथ रखते हैं। गाणपत्य सँप्रदाय वाले श्रम की पूँजी को ही धर्म की पूँजी घोषित करते हैं; उनकी मान्यता है कि श्रम करने वालों के लिए  गणेश जी भविष्य के द्वार  स्वतः खोल देते हैं। गणेश जी उस संगठित समाज के सूत्रधार हैं, जो जातिभेद,लिंगभेद, वर्गभेद और वर्ण व्यवस्था से ऊपर है। तभी तो गणपति समान शुभ-समान लाभ का विचार फैलाने के कारण सबके आराध्य हैं। उनका पेट बहुत बड़ा है,  इसलिए वे सब छोटी-मोटी बातें पचा जाते हैं; कान सूप की तरह इसलिए हैं, क्योंकि ...

प्रेम व समर्पण का पर्व

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  हरितालिका तीज पर प्रेम व समर्पण का पर्व                  @मानव हिंदू पर्वों और त्योहारों  में  शिव पार्वती को समर्पित भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन हरितालिका तीजपर्व, सँबंधों की स्थिरता और स्त्री आस्था का प्रतीक है। यह पर्व यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक तपस्या है; जो स्त्री के त्याग,शक्ति और श्रद्धा को उजागर करता है और उसे एक नई ऊँचाई  प्रदान करता है। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए  कठोर तपस्या के मध्य इस व्रत को देवी पार्वती की सहेलियों ने उनका हरण करके, घने जंगल में करवाया था,  अतः यह हरतालिका तीज है। देवी पार्वती की निष्ठा से प्रसन्न शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी स्वीकारा उसी की स्मृति में यह व्रत अनुकरणीय है। आस्था का प्रतीक तीज  समाज में  वैवाहिक संबंधों की स्थिरता और स्त्री की आस्था का भी  प्रतीक है। यह पर्व नारी की सहनशक्ति, प्रेम,समर्पण और आत्मबल को प्रकट करता है; ऐसे पर्व हमें फिर से सँस्कारों और मूल्यों की ओर लौटने की प्रेरणा देते हैं। ...

मानवता को सँबोधन

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  गुरुवाणी प्रकाश वर्ष पर, मानवता को सँबोधन           @मानव गुरबाणी ज्ञान का अथाह सागर है; जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब के  सैद्धांतिक उपदेशों में  ऐतिहासिक आचरण व कर्मों के माध्यम से एक सकारात्मक एवं रचनात्मक सँस्कृति के  निर्माण का आधार है। इसमें संपूर्ण जीवनशैली को  एक अनूठा रूप दिया गया है; इसका सँदेश सँपूर्ण मानवता को सँबोधित है। गुरुओं ने गुरबाणी में  आध्यात्मिकता के सिद्धांतों के माध्यम से  मानवीय चिंताओं की पहचान की और आत्मा को उसकी  वास्तविकता के सत्य का बोध कराया। एक शाश्वत ईश्वर और नाम सिमरन में विश्वास पर बल देते हुए इसमें सभी कर्मकाण्ड का त्याग हुआ और बताया कि ईश्वर सृष्टि का निर्माता है।  ईश्वर पालनहार, उद्धारकर्ता, निर्गुण, सगुण, निर्भय, द्वेष मुक्त, सर्वव्यापी है; फिर भी एक है। सिख पन्थ में श्रम साँसारिक कार्य नहीं, बल्कि धार्मिक कार्य है; सिख समुदाय के लिए गुरु ग्रन्थ साहिब ने  उच्च-शुद्धता वाले  श्रम-जीवन जीने का मूल आदर्श प्रस्तुत किया। गुरमत ने ऊँच-नीच का भेद मिटाकर सेवा को एक नया अर्थ दिया...

स्वाधीनता का महत्व

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  स्वाधीनता का महत्व                 @मानव स्वाधीनता केवल एक शब्द नहीं, अपितु एक वृहद विचार है; यह शक्ति का पुँज है और सामर्थ्य का स्रोत भी है। जब हम स्वाधीनता का  अनुभव करते हैं तो हमारे मस्तक पर चमक उत्पन्न हो जाती है; सीना गर्व से फूल जाता है;  हम स्वयं पर स्वयं का  नियंत्रण महसूस करते हैं। स्वतँत्रता का अर्थ है, स्वयं के तँत्र में रहना; अपनी व्यवस्था बनाकर रहना; अपने स्वभाव में रहकर जीना। व्यवस्था ऐसी हो, जो किसी दूसरे को  अव्यवस्थित न कर दे; यह बात व्यक्ति,पारिवार,समाज व राष्ट्र के लिए भी लागू हो; यह व्यवस्था आत्म-नियंत्रण  और आत्म-साक्षात्कार से भी जुड़ी हो। स्वाधीन राष्ट्र वह है, जिसके पास सृजन शक्ति है उनके लिए पालन-पोषण की कोई चिंता न रहने दी जाए।  उन्हें सृजन के अवसर दिए जाएँ। व्यक्तिगत स्वतँत्रता तब है,  जब हर व्यक्ति को अपनी  क्षमताओं और प्रतिभा को  विकसित करने और अपने जीवन का  निर्णय लेने की स्वतँत्रता हो। राजनीतिक स्वतँत्रता तब है,  जब देशवासियों में एकता  और अखण्डता बन...

रक्षासूत्र की परिभाषा

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  रक्षासूत्र की परिभाषा                 @मानव रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक अनुपम पर्व है, जो भाई-बहन के स्नेह,विश्वास और सुरक्षा के वचन का  प्रतीक रहा है। रक्षाबंधन... केवल एक त्योहार नहीं,  एक अनुभव है; यह वो दिन होता है जब घर के आँगन में रेशमी राखियों की झनकार होती है, रसोई से मिठास की सुगंध आती है, और भाई-बहन की ठिठोली में बचपन फिर से लौट आता है। रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है जो डोरी से नहीं, दिलों से जुड़ता है; क्योंकि सच्चा भाई या बहन केवल रक्त या जन्म से ही नहीं बल्कि हृदय के गहरे जुड़ाव से होता है वही परम बंधु है। न केवलं रक्तसम्बन्धः न केवलं तनुजातिः। हृदयं यत्र संयुक्तं स बन्धुः परमो मत॥ यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि परंपराएं केवल रस्में नहीं, बल्कि समाज की जड़ों से जुड़ी भावनात्मक और नैतिक  सँरचनाएं होती हैं, जिन्हें समय के साथ नया अर्थ देना आवश्यक होता है। वैदिक काल में 'रक्षा विधान' एक अनुष्ठान होता था,  जिसमें पुरोहित अपने यजमानों को मौली बाँधते थे; यह रक्षा का प्रतीक ही नहीं,  बल्कि दायित्व और मर्यादा का...

अमङ्गल रूप मङ्गलमय शिव

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  अमङ्गल रूप मङ्गलमय शिव                  @मानव भगवान शंकर समस्त विद्याओं के प्रवर्तक  और प्राणियों के हृदय में  विराजमान अंतर्यामी प्रभु हैं।   ( श्रीमद्भागवत महापुराण ) जगत के संतों के एकमात्र आश्रय और आदर्श भी वही हैं;  भगवान शिव के आदर्श का चिंतन हमें जीवन के गहरे अर्थ  समझा देता है। शंकर जी अमङ्गल चिन्हों को  धारण करते हुए, परम मंगलमय हैं, 'अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं। तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मङ्गलमसि।'   (महिम्न स्तोत्र) हे महादेव ! यद्यपि श्मशान में निवास,  भूत-पिशाचों का साथ,  चिताभस्म-लेपन तथा मुंडमाल-धारण आदि  आपका आचरण प्रकट रूप से अमङ्गल ही है, तथापि आपका नाम-स्मरण  करने वालों का सर्वविध मंगल होता है। शिव का यह वैशिष्ट्य जीवन के लिए एक सुंदर सँदेश रचता है  कि अपनी आध्यात्मिक निष्ठा द्वारा भौतिक अमाङ्गल पर  विजय प्राप्त करना ही दिव्य जीवन है। जीवन विविध वस्तुओं और परिस्थितियों का विराट सामञ्जस्य है; मनुष्य इस विविधता के बीच  अपनी अनुकूलताओं...