राधा-कृष्ण अभिन्न
राधाष्टमी पर, राधा-कृष्ण अभिन्न @मानव भारत की आध्यात्मिक भूमि में जो एक शब्द-रस की चिरंतन धारा बनकर प्रवाहित है, वह है ‘राधा’। वेद,पुराण,आगम,स्मृतियाँ, सर्वत्र राधा नाम का अमृत सीझा हुआ है; कृष्णोपासना की विराट परंपरा राधा शब्द की उपासना में स्वयं को चरितार्थ करती है। ‘रा’ का अर्थ है रास और ‘धा’ का अर्थ है धारण; रासोत्सव में श्रीकृष्ण को आनंद की अवस्था में आलिंगनादि के द्वारा उन्हें धारण करने से राधा शब्द की क्रियसिद्ध होती है। वृंदावनेश्वरी,रसिकेश्वरी और रासेश्वरी के विरुद से विख्यात पराशक्ति श्रीराधा समर्पण,अनुराग एवं तत्सुखसुखित्व की परम प्रमाण हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्ण से सर्वथा अभिन्न हैं; श्रीकृष्ण का सौंदर्य-माधुर्यादि सब श्रीराधाजी की ही छाया है जा तन की झाँईं परी स्यामु हरित दुति होय। ( भक्तिकवि बिहारीलाल ) नित्य गोलोक धाम में भगवान श्रीकृष्ण के साथ एकरस विहार करने वाली श्रीराधा ‘श्रीदामा के शाप के कारण उनका श्रीहरि से सौ वर...