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Showing posts from January, 2025

मौन का महत्व

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  मौन का महत्व              @मानव वाणी आंतरिक ऊर्जा है इस ऊर्जा की बचत करना ही मौन है; वाणी की सर्वोत्तम तपस्या  मौन को कहा गया है। मौन की अवस्था व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण,  आत्मज्ञान और शाँति का  अनुभव कराती है; मौन के भाव को प्राप्त हो जाना ही मुनि हो जाना है। मौन वह तप और साध‌ना है  जो बहिरंग से सबंध तोड़कर  अंतस में स्थित आत्मतत्व से रिश्ता जोड़ती है। मौन आत्म-अनुशासन और आत्मज्ञान का  सरलतम साधन है; इससे इंद्रियनिग्रह की प्रवृत्ति का विकास होता है।  मौन से शारीरिक,मानसिक  और आत्मिक ऊर्जा की  बचत होती है जो आत्मसाक्षात्कार में  उपयोगी होती है। वाणी पर नियंत्रण कई अप्रिय स्थितियों से बचा लेता है; भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता में मौन उच्चतम तपस्या है।  मौन निद्रा के समान है जो विवेक को नई स्फूर्ति देता है; यह न केवल आत्म-निरीक्षण और आत्मज्ञान की ओर  प्रेरित करता है, बल्कि मन को स्थिरता  प्रदान करता है। मौन मन,विचार और वाणी  सभी को संयमित रखता है;  जब हम मौन रहते हैं तो अप...

सृजन से विसर्जन तक की यात्रा

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  सृजन से विसर्जन तक की यात्रा                @मानव परमार्थ प्रकृति का मूल स्वर है; परमात्मा स्वयं भी  पारमार्थिक कार्यों में संलग्न है; लोक कल्याण की संसिद्धि के लिए समुद्र मंथन में कूर्म का रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण कर स्वयं भगवान नारायण  देवगणों के सहायक हुए,  जिसकी मूल भावना सृजन की ही थी। समुद्र मंथन अर्थात् मनोमंथन  अर्थात् हम जब भी मंथन करते हैं तो निश्चित रूप से सँकल्प लेते हैं; यदि सँकल्प शुभ व पारमार्थिक हो तो  नियंता,नियति,परमात्मा,प्रकृति व सकल देवसत्ता  अभीप्सित लक्ष्य संप्राप्ति में  सहायक बनने लगते हैं। वेदोक्त है कि ' तन्मे मनः शिवसँकल्पमस्तु '  अर्थात् जो मनोजयी है वही अमृतत्व का अधिकारी है। निरभिमानिता ईश अनुग्रह और समस्त लौकिक-पारलौकिक  अनुकूलताओं का मूल है।  समुद्र मंथन में निकला अमृत श्रम की ही निष्पति थी; देव-दानव सँग्राम में अमृत घट से छलकी बूँदों से  महिमामंडित चार स्थानों में  कुम्भ राग गूँजता है। कुम्भ पर्व के मध्य पवित्र सलिलाओं का जल...

राष्ट्रभक्ति व सँविधान

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  राष्ट्रभक्ति व सँविधान               @मानव ( १ ) राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का पर्व  और देश का स्वर्णिम भविष्य गढ़ने का अवसर है गणतँत्र दिवस! यह एक राष्ट्रीय महायज्ञ है  जिसमें हर नागरिक को  अपनी योग्यता एवं सामर्थ्य के अनुसार  आहुति देनी है। सत्कर्तव्य की यह आहुति न केवल आत्मिक सुख  प्रदान करेगी, अपितु राष्ट्र को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठापित भी करेंगी। " वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः "     ( यजुर्वेद ) इस मंत्र के साथ  यह पर्व जनमानस को  जागृत कर राष्ट्रभक्ति के लिए प्रेरित करता है। ईश्वर की नवधा भक्ति से  कम नहीं होती राष्ट्रभक्ति!  अतः मन,वाणी एवं कर्म से  हमारा समग्र चिंतन राष्ट्र को समर्पित हो। जिस देश के नागरिकों में गहन राष्ट्रभक्ति हो, वहाँ के गणतँत्र को कोई खतरा नहीं हो सकता; गणतँत्र की सफलता एवं देश के स्वाभिमान की रक्षा नागरिकों की उच्च चिंतन दृष्टि से होती है। गणतँत्र दिवस सँविधान की  अभ्यर्चना का पर्व है और योगक्षेम की प्राप्ति का  अप्रतिम साधन। जब विधान के बिना...

मन का सँगम

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  मन का सँगम                @मानव सँपूर्ण भारत ही तीर्थ है,  लेकिन जहाँ जल हो,  अक्षयता हो, वहीं तीर्थ है, चाहे सरिता के रूप में हो या सरोवर के रूप में। प्रयागराज सिर्फ पावन नदियों का सँगम नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व को एक करने और मिलाने की भूमि है; यहाँ का हर घर तीर्थ है। यहाँ भिन्न-भिन्न विचारधाराओं और सँस्कृतियों का मेल  अनुकरणीय है, जो दुनिया के साथ समन्वय की भूमिका का  अहम केंद्र भी है। सँगम तट पर कुम्भ से सबको जोड़ने की परंपरा रही है; यह विश्व को सँगम तट पर  एक करने का कुम्भ है, जो दुनिया के एकजुट होने का महापर्व भी है। प्रयागराज की भूमि ने  अगाध वैचारिक सँगम विश्व को दिया है, यहाँ परस्पर विरोधी होते हुए भी, सँगम की भूमि पर एक साथ स्नान करते हैं तीर्थराज सबको मिलाता है।   कुम्भ यानी अमृत कलश; कुम्भ शगुन का भी होता है; कुम्भ बाहर से कठोर, अंदर से खाली भी होता है। वेदांत में कुम्भ घटाकाश के रूप में यानी हृदय एक कुम्भ है; कुम्भ एक राशि भी है; कुम्भ के भावों में गङ्गा और शिव समाहित हैं।  तीर्थराज ...

मंथन

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  मंथन                 @मानव समुद्र मंथन और उससे प्राप्त अमृत के लिए संघर्ष के स्मरण का परिणाम  महाकुंभ है।  रत्नों की प्राप्ति सहज नहीं,  अमृत की तो कदापि नहीं; सागर सदृश हमारा मानस  अनुपम रत्नों का भंडार है,  जिसमें आसुरी एवं दैवी प्रवृत्तियों का मंथन चलता रहता है। अमृत की प्राप्ति तभी होती है, जब इंदिय निग्रह एवं अंतर्मुखी साधना के प्रतीक कच्छप की पीठ जैसा  मजबूत आधार हो। दृढ़ संकल्प के प्रतीक  मंदराचल जैसी मथानी से  इस मानसरोवर का मंथन किया जाए तब लोक मंगलकारी अमृत तुल्य चौदह नहीं,  असंख्य रत्नों का प्राकट्य  सँभव होता है; किंतु पहले शिव बनकर  हलाहल पीने के लिए तैयार रहना पड़ता है। मंथन में संघर्ष का भाव ध्वनित है; यह भाव सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है; इसीलिए प्रत्येक जीव हर पल संघर्ष करता दिखाई देता है; किंतु मंथन में संघर्ष का उद्देश्य मांगलिक होता है।  ज्ञानप्राप्ति का आधार भी  मानस का मंथन है जिससे गुरु अपने शिष्य को  ज्ञानामृत का पान कराता है; इसीलिए संपूर्ण आध्या...

सनातन सँस्कृति का शिखर

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  सनातन सँस्कृति का शिखर             @मानव भारत का चित्त और विवेक  सनातन धर्म से प्रेरित है; इसी धर्म से संचालित  भारतीय सँस्कृति हजारों वर्ष के अनुभवों का परिणाम है। अनगिनत श्रद्धालुओं की  जिज्ञासा है महाकुंभ! भारतीय सँस्कृति एवं परंपरा में प्रतीक गढ़ने और उन्हें लोकप्रिय बनाने की अद्‌भुत क्षमता है; सँस्कृति,परंपरा,धर्म-दर्शन का ऐसा ही प्रतीक है महाकुंभ। सँस्कृति और परंपरा  अंधविश्वास नहीं अपितु विशेष प्रकार के इतिहास हैं; शुभ को राष्ट्रजीवन से जोड़ना और लगातार सँस्कारित करना सँस्कृति है। राष्ट्रजीवन में बहुत कुछ करणीय है, यहाँ धर्म,दर्शन,संस्कृति, परंपरा और आस्था राष्ट्रजीवन के नियामक तत्व हैं; ये पाँच तत्व राष्ट्रजीवन को  ध्येय और शक्ति देते हैं। कुंभ इन्हीं पाँचों तत्वों की  अभिव्यक्ति है; करोड़ों श्रद्धालुओं का बिना किसी निमंत्रण प्रयाग पहुँचना आश्चर्य पैदा करता है; करोड़ों आस्थावश आए हैं; तमाम जिज्ञासावश आए हैं  और लाखों आश्चर्यवश। महाकुंभ समागम सँस्कृति प्रेमियाँ का  महाउल्लास है जहाँ समग्र भारत था; ऐसा आश्...

साँस्कृतिक समागम का शँखनाद

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  साँस्कृतिक समागम का शँखनाद              @मानव शताब्दियों से अनवरत चली आ रही साँस्कृतिक यात्रा का पड़ाव  जिसमें नदियाँ हैं, कथाएँ हैं, मिथक हैं, अनुष्ठान हैं, सँस्कार हैं, सरोकार हैं और शामिल हैं हमारी अनगिनत आध्यात्मिक और सामाजिक चेतनाएँ, जिनके बलबूते हम अपनी परंपराओं को बखूबी निभाते आए हैं वही कुम्भ है। इस अद्भुत,अप्रतिम,  अलौकिक यात्रा में शामिल है बारह वर्ष की प्रतीक्षा, पवित्र नदियों के पुण्य तट, नक्षत्रों की विशेष स्थिति, विशेष स्नान पर्वों की धमक,  साधु-संतों की जुटान, धर्म आकाश के सभी सितारे  और उनका वैभव,  कल्पवासियों की आकाँक्षाएँ।  अथक प्रवाहमान इस यात्रा में नदियों की आवाजें भी हैं, जिन्हें सुनने स्वयं कुंभ आता है तो कुंभ में शामिल होने का  स्वप्न संजोए करोड़ों लोग भी। लोकोत्सव की इस यात्रा में  भारतीय सँस्कृति कुलाँचें भरती, अठखेलियाँ करती पूरे विश्व को स्वयं में  समाहित कर लेने की ताकत दिखा देती है; जहाँ 'वसुधैव कुटुंबकम' की  भारतीय अवधारणा  सहजता से चरितार्थ होती है। भारतीय सँस...

तमसो मा ज्योतिर्गमय

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  तमसो मा ज्योतिर्गमय           @मानव मकर संक्रांति पर सूर्य  उत्तरायण हो जाते हैं और धरती पर प्रकाश का  प्रभाव बढ़ जाता है। यही यात्रा है तमसो मा ज्योतिर्गमय की, जब उन्नति,उत्तम विचारों,  सात्विकता,कर्तव्यपालन  त्याग,सत्य,दया,क्षमा आदि की ओर हम प्रवृत्त होते हैं  तब मानना चाहिए कि हम  उत्तरायण की यात्रा पर चल पड़े हैं। ज्योतिष चक्र की कुल बारह राशियों में सूर्य का भ्रमण होता है।  जिसे सौर राशि कहते हैं; सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को  संक्रांति कहा जाता है। जब सूर्य धनु राशि का  भ्रमण पूर्ण कर मकर राशि में प्रवेश को  उद्यत होता है, उसी काल को मकर संक्रांति कहा जाता है। मकर राशि का स्वामी शनि है, जो सूर्य का पुत्र है; मकर में सूर्य का प्रवेश  पिता-पुत्र के पुनर्मिलन का  संकेतक है। सूर्य आत्मा का प्रतीक है,  जबकि शनि दुःख कारक  एवं दुःखहारक भी है; शनि कर्म का भी प्रतीक है।  सूर्य एवं शनि दोनों जीवों के कर्मसाक्षी भी हैं; न्यायाधीश शनि, सूर्य के कर्माकर्म के विभाजन से ही ज...

उत्तरायण का संदेश

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  उत्तरायण का संदेश           @मानव पर्व,अनुष्ठान भारत की  जनसंस्कृति के आधार स्तंभ हैं; हमारे पर्व ऊर्जा एवं दिव्यता का संचार करने वाले हैं। उत्तरायण को सकारात्मकता एवं आध्यात्मिक ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक माना गया है तथा दक्षिणायन मार्ग को  नकारात्मकता का। मकर संक्रांति के मंगल पर्व से ही सूर्य की उत्तरायण गति  प्रारंभ होती है; इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। उत्तरायण नव स्फूर्ति,  प्रकाश और ज्ञान के साथ  जोड़ा जाता है; सूर्य के उत्तरायण की ओर जाने से प्रकृति भी परिवर्तित होती है। इस दिन से ही सूर्य उत्तरी गोलार्ध में आना शुरू होता है,  फलस्वरूप रात छोटी तथा दिन बड़े होने लगते हैं।  इस प्रकार यह उत्तरायण हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने को प्रेरित करता है;  समस्त जीवधारी प्रकाश चाहते हैं। भौतिक प्रकाश एवं आध्यात्मिक प्रकाश से ही प्राणियों में नई ऊर्जा का  संचार होता है। प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है  प्रकाश अधिक होने से  प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होती है। मकर संक्रांति के ...

वसुधैव कुटुम्बकम्

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  वैश्विक परिवार दिवस वसुधैव कुटुम्बकम्            @मानव भारत सदा से विश्व बंधुत्व की भावना के  सिद्धांत को अपनाकर उसी मार्ग पर चलाता आ रहा है; यह दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो हमेशा से सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास करता रहा है। दुनिया के किसी भी देश में  कैसा भी संकट आया हो  भारत उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा नजर आता है; यही है विश्व बंधुत्व की भावना। वैश्विक परिवार दिवस  दुनिया का कोई देश यदि सही मायने में मनाता है  तो वह भारत ही है; जहाँ आज भी अतिथि देवो भव की भावना  साकार है; यहाँ के जन स्वयं भूखे रहकर अतिथियों को भोजन करवाना अपना परम धर्म समझते रहे हैं। वैश्विक परिवार का अर्थ है  वसुधैव कुटुम्बकम् इसका मूल सिद्धांत यह है  कि संपूर्ण मानवता एक परिवार है; किसी भी राष्ट्र,जाति या धर्म का व्यक्ति एक ही व्यापक परिवार का हिस्सा हैं विश्व में सभी का समान महत्व है और हर किसी को समान सम्मान मिलना चाहिए। वैश्विक परिवार दिवस वस्तुतः विश्व शाँति दिवस है; जो दुनिया में सद्भाव और एकता की अवधारणा को जीवन्त करने के ल...