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रथयात्रा का सांसारिक सरोकार

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  भगवान जगन्नाथ रथयात्रा पर विशेष रथयात्रा का सांसारिक सरोकार         @मनोज जन्म से अंत तक मानव जीवन यात्रामय है। मानव शरीर में परमात्मा की उपस्थिति सूक्ष्म रूप में हैं, उसे ले चलने की दिशा पारिवारिक  तथा सामाजिक परिवेश के साथ स्वविवेक से निर्धारित करना पड़ता है।  मनुष्य देह एवं चेतना शक्ति के मिलने से रथ रूपी शरीर की यात्रा अग्रसर होती है, इसमें गति के लिए पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, ज्ञानेन्द्रियों की लगाम मन से जुड़ी रहती है, मन की नियंत्रक हमारी बुद्धि है, मन और बुद्धि के ऊपर विवेक ध्वज-सम है; इस स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर के समन्वय से जीवन यात्रा संचालित होती है। स्थूल शरीर जड़ है उसे सूक्ष्म शक्ति संचालित करती है, यानी सूक्ष्म शक्ति सारथी की भूमिका में है;  इसी सूक्ष्म शक्ति को तेजस्वी बनाने के लिए मन को साधना अत्यंत आवश्यक है।  मन ही अश्व है इसे विवेक रूपी लगाम से  नियंत्रित रखा जाए, तो जीवन यात्रा की दिशा  सकारात्मक होती है, तभी जीवन यात्रा गंतव्य तक पहुँच पाती है।   ~मनोज श्रीवास्तव

योग

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  अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष योग माहात्म्य         @मानव चितवृत्ति का ईश्वर में विलीन हो जाना  योग है; भगवान की अहैतुकी कृपा से जो महायोग बनता है। न बुद्धि की सत्ता हो ना मन की चंचलता चित्त में संस्कार शेष न रहे  यही स्थिति योगी की है, जो ईश्वर से एकाकार होकर प्रेम रस से भर जाता है,  वाणी अवरुद्ध हो जाती है,  मन रिक्त हो जाता है ।  भक्त का योग जब भगवान से होता है  मन, बुद्धि और चित्त के साथ साधन अहम् शून्य हो जाता है, मन,बुद्धि, चित्त और अहम् की स्वीकृति केवल साधन काल में होती है पर साध्य की परम प्राप्ति में इनकी विस्मृति ही योग है।  संयम की प्रामाणिकता भी  योग से ही सिद्ध होती है, ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों की अर्जित शक्ति का एकत्रीकरण योग द्वारा किया जाता है  योग चाहे ध्यान-रूप में हो  या व्यायाम-प्राणायाम रूप में  उसकी शक्ति को एकत्र करके उसका उपयोग ही वास्तविक योग है। जब तक योग जीवन में  आत्मसंयम न आ जाए तब तक क्रियात्मक योग  मात्र शरीर संवर्धन होगा। वह योग कुयोग है वह ज्ञान अज्ञान ...

पिता

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  पितृ दिवस पर विशेष पिता         @मानव पिता है बरगद की शीतल छाँव  जो सदा है गंभीर मन से छुपे लाखों भाव  आँख नीर विहीन । अबूझ दुनियावी संघर्ष में   सदा थामे हाथ, ईश्वर की प्रतिमा  व बच्चों की पहचान बन हार कर हर सुख, जो सदा मुस्कराया है; बच्चों का हर दुःख जो स्वयं सहता आया है; पिता की स्मित मुस्कान ने हमें दुनिया से अभय दिलाया; शतरंज की यह विजय  दूसरा समझ न पाया। पिता बिना  सफर एकाकी, राह सुनसान,  जिंदगी वीरान, अधूरा संसार, हर तोहफा लगे बदरंग; एक दिन मात्र याद करने से क्या हो पाएगा उनका समुचित सम्मान?  ~ मनोज श्रीवास्तव

कबीर-दृष्टि

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  कबीर जयन्ती पर विशेष , कबीर-दृष्टि        @मानव प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक  दृष्टिवादी संत कबीर अतिवाद विरोधी हैं। अध्यात्म जगत  स्पष्ट करता है  कि मनुष्य लोकेषणा,  वित्तेषणा, और पुत्रेषणा के चलते आनन्द से दूर होता है, जो ब्रह्मानन्द का अंश है, कबीर उसी ब्रह्मानन्द को पहाड़ मानकर पूजने की बात करते हैं; कबीर का "साँई" अंतर्जगत का मालिक है; जबकि उनकी "चाकी"  अंतर्जगत की चक्की है, मन और मस्तिष्क की चक्की से जहाँ विवेक का पदार्थ निकलता है। संत कबीर की उल्टबाँसी  मानव के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु तक के प्राकृतिक स्वरूप को प्रदर्शित करती है। प्रकृति में व्याप्त ऊर्जा को जब मनुष्य ग्रहण करने लगता है, तब संवेदना, मानवीय मूल्यों एवं दैवीय गुणों की बरसात उस पर होने लगती है। सन्त कबीर के दोहों में वर्तमान इंटरनेट युग के  चिप जैसी समाहित विशाल क्षमता है जिसमें मानव जीवन को  सार्थक बनाने का भाव  समाहित है।   ~ मनोज श्रीवास्तव

गङ्गा केवल नदी नहीं

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  ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, गङ्गा अवतरण दिवस पर विशेष , गङ्गा केवल नदी नहीं         @मानव गङ्गा महनीय एवं अलौकिक  ईश्वरीय द्रव वाली मोक्षदायिनी और पवित्रतम नदी जो मात्र नदी नहीं  अपितु अमृतत्व का प्रवाह है। गङ्गा त्रय योग सिद्धि कारक है  जो ब्रह्म कमंडल से निकलकर ज्ञानयोग, विष्णु चरण स्पर्श करते हुए  भक्तियोग, शिव जटा से धरा-धाम पर अवतरित हो वैराग्य योग  सिद्ध करती है। गंगा का अवतरण  पूर्वजों के असीम श्रम साधन का  ही परिणाम है, जो मर्त्य लोक में पतितों के उद्धार का माध्यम बनी।  तभी तो गंगा में अस्थि प्रवाहन से  भोग,भाग्य और मुक्ति से  हम निश्चिंत हो जाते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दस दिव्य योगों में  माँ गङ्गा का  धरा पर अवतरण  तीन दैहिक, चार वाणी जनित व तीन मानसिक, कुल दस पापों का  क्षरण करती है। गंगा स्नान से अक्षय और अनंत फलश्रुति, व पितरों को  अक्षय तृप्ति की प्राप्ति होती है; और सकल देव सत्ता हमारे अनुकूल हो जाती है; गंगा का स्मरण, पूजन और संस्पर्श से हमारे देवता और पितृ  स्वत: तृप्त ...

रामनामामृत

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  ज्येष्ठ मास के मंगलवार पर विशेष रामनामामृत         @मानव वेद का सार और सृष्टि का सार रामनाम है, राम नाम का अमृत  पूर्णानंद, अखण्डानंद, आत्मानंद, परमानंद है । वही पूर्ण ज्ञान है और वही पूर्ण भक्ति है जिसका दर्शन हनुमान जी के जीवन में  पग-पग पर होता है। सदैव हनुमान जी  उस रामामृत का पान करते रहते हैं  जिसमें तृप्ति कभी संभव नहीं है। पूर्ण को पा लेने के बाद भी  बार-बार उसी का ध्यान करना  पूर्ण भक्ति है और हनुमान जी इसके साक्षात् प्रमाण हैं। निष्ठा का सच्चा स्वरूप  राम नाम है जिसमें अपने विरोधी के प्रति भी  अहित भावना का अभाव रहता है। महानतम विवेक के कारण  हनुमान जी का शौर्य और धैर्य, सत्य और शील सबमें एकरसता और स्थिरता, बनी रहती है, मूलाधार में स्थित रहना  इसका कारण है। चारों दिशाओं में एक ही तत्व के दर्शन,  करने वाले हनुमान जी  दक्षिणमुख होकर भी  पूज्य हैं। सबकी योग्यता का उपयोग कर लेना ही  श्रीराम और हनुमान जी की पूर्णता है, यही उनकी व्यापकता है। यही व्यापकता सीता जी व श्री राम हैं  जिनम...

ऋत सत्य के संवाहक

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  देवर्षि नारद जयन्ती (ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया) पर विशेष   ऋत सत्य के संवाहक         @मानव भगवान के कल्याणकारी,  करुणामय संकल्प को  मूर्त रूप देने का कार्य  देवर्षि नारद जी करते हैं। जिन कारणों से  लोगों के मन में नारद-सम भक्तों के प्रति  भ्रम की स्थिति होती है, वे शुद्ध आध्यात्मिक हैं,  ऋत सत्य के संवाहक  नारद जी वह किरण हैं जो रामचन्द्र व कृष्णचन्द्र की ही किरणों के प्रकाशक हैं, हर कार्य में उनका उद्देश्य  जीव का आध्यात्मिक कल्याण ही है। भगवान के भक्तों में  विश्वास और समर्पण के  संस्कारों का बीजारोपण कर भक्ति, भक्त और भगवंत को एकाकार करने की भूमिका  नारद जी की है। चाहे वे भक्त हों  या वे दिग्भ्रमित जन  जो भगवान की लीला  न समझ पा रहे, उन्हें सन्मार्ग पर लाने का महान कार्य नारद जी ही करते हैं। भगवान के साथ बंधन को  मुक्ति मानना भक्ति है और यही मुक्ति भी; भक्ति के अभाव में  मुक्ति-सुख असंभव है नारद जी भक्त को भक्ति  और ज्ञानी को मुक्ति का  वितरण करते हैं। भक्ति-सत्य-सन्...