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नाग देवता

सृष्टिकर्ता की हताशा के अश्रुकण से उद्भूत, मानव मूलाधार चक्राकृति, सहस्त्रसार चक्र सम फण, सूर्य द्वारा घोषित पञ्चमी अधिकारी, विष्णु शैय्या सेवा प्रदाता (शेषनाग), शिव के कण्ठहार, फण पर महिभार धारक, रुद्र,गणेश व कालभैरव के यज्ञोपवीत, सृष्टि संचालन में ग्रह भूमिका (अष्टनाग), पितृ दोष निवारक, कुलोन्नति माध्यम, नागदेवता! शिरश: नमामि! मनोज श्रीवास्तव

महादेव

 (१) वे भयंकर रौद्ररूप हैं तो भोलेनाथ भी। वे दुष्ट संहारक कालरूप हैं तो दीनों के दया सिंधु भी। वे सृष्टि रचयिता हैं तो संहारक भी। वे आदि हैं तो अनन्त भी। वे भक्तों को सुखानन्द प्रदाता हैं तो स्वयं विरक्त भी। लय व प्रलय दोनों के स्वामी शिव परस्पर विरोधी शक्तियों के मध्य सामञ्जस्य निर्माण के सुन्दरतम प्रतीक  सम्पूर्ण देव हैं। ऐसे महादेव की शरण अभयास्थल है। (२) ज्ञान वैराग्य व साधुता के परमादर्श परम कल्याणमय समस्त विधाओं के मूलस्थान सङ्गीत व नृत्य के आचार्य मङ्गलों के मूल आदि-अंत से परे अनन्त रक्षक-पालक-नियन्ता महेश्वर देवी-देवताओं में सम्पूर्णता के प्रतीक महादेव! मनोज श्रीवास्तव

लघु कथा : माँ अच्छी-माँ बुरी

  लघुकथा : माँ अच्छी-माँ बुरी ! वय 15 की अल्हड़ किशोरी! विकसित शरीर के प्रति बेपरवाह! क्योंकि बुद्धि का विकास अभी बालोन्मुख! आसपास की चीजों का अवलोकन करती माँ के साथ बाजार में जा रही थी। तभी रास्ते में दो मनचले पीछे हो लिए।पर माँ को तो दीन-दुनिया का अनुभव था।उसने बिना पीछे देखे परिस्थिति समझ ली।एकाएक पलटी।माँ की खा जाने वाली निगाहें देख शोहदों ने कन्नी काट जाने में ही भलाई समझी।किशोरी चैतन्य हुई।उसे वर्तमान का बोध हो आया।परिस्थिति को समझ माँ के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर बैठी-"माँ तुम कितनी अच्छी हो!" ************** किशोरी के सहपाठी का जन्मदिन!रात में पार्टी!माँ ने समझाया-बेटा!एक तो दूरी दूसरा पापा के दो-तीन के लिए बाहर होने से वह सूर्यास्त के बाद उसे बाहर जाने नहीं दे सकती।वह फोन पर ही विश कर ले।ऊँच-नीच समझाने का प्रयास किया पर बेटी जिद पर थी...दोस्तों के साथ मस्ती जो करनी थी।अंततः माँ ने वीटो- पॉवर इस्तेमाल किया-रागिनी!तुम्हें कहीं नहीं जाना।तुम्हें मेरे पास ही रहना है जब तक पापा नहीं आ जाते!बेटी नाराज़ होकर पैर पटकती कमरे में चली गयी।गुस्से में बड़बड़ाई-"माँ तुम कितनी बुरी...

लघुकथा : पूर्वाग्रह

                     लघुकथा : पूर्वाग्रह "आज शाम घर पर कोई ना होगा लक्ष्मी!" हाय दैया! कितनी बेशर्मी के साथ बोल गया था वह! पर मेरे मन में हूक सी दौड़ गई।इस घर में काम करते हुए मुझे साल भर होने को आए हैं।मैं जब घर में घुसती हूँ तो वह कभी आगे के कमरे में ही बैठा होता है तो कभी लॉबी में।मुझे देख कर  मुस्कुरा भर देता है बस!शायद बीवी से डरता है।इसलिए मुझे कभी-कभी डरता कनखियों से देखता भर लगता है।उसकी मुस्कान से मुझे कभी तो लगता है कि वह मुझे पसंद करता है,पर कभी तो लगता है कि मैं मुगालते में हूँ।बड़े घरों की तो यही रीति है कि बीवी की डाँट और खिच-खिच से आजिज मर्द पराई औरतों को,विशेषकर हम कामवालियों को ललचाई नजरों से देखते हैं और बात करने का मौका तलाशते हैं।पर इस नासपीटे की बीवी से तकरार भी नहीं सुनी है।दोनों कबूतर-कबूतरी की तरह गुटर-गूँ करते रहते हैं।उनके इस प्यार व कलह रहित वातावरण के कारण ही तो मैं आज तक समझ ही नहीं पाई कि उसकी नजर व मुस्कान वासना से भरी, ललचाई हुई है या और कुछ!  पर आज उसके शब्दों ने करंट छुआ दिया।हम औरतों की य...

क्रान्ति कथा:जिसने पत राखी

 क्रांति-कथा (३१ जुलाई पर विशेष)                   जिसने पत राखी  वर्ष १९१९ के अप्रैल मास की वह सुबह।उस बगिया में हजारों बच्चे-बूढ़े और जवान चारों ओर फैले सरसों के पीले और मदमाते फूलों व झूमती बालों के बीच से गुजर कर आए थे। सभी मस्ती में हँसी-ठिठोली कर आनंदित हो रहे थे।शाम ढलने को आयी कि चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरे जलियाँवाला बाग में अंग्रेज सेना के जवान घुसने लगे।उन्होंने दीवार के समान्तर अन्दर की ओर एक और दीवार बना डाली। मशीनगनें निहत्थे आबाल वृद्ध नर-नारियों की ओर उठ गयीं।दरवाजे पर खड़े जनरल डायर की आदेशात्मक पिस्तौल गरजी तो मशीनगनों से आग बरस उठी।चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।भागने का कोई ठौर ठिकाना नजर नहीं आ रहा था।कोई भागा तो कुएँ में जा गिरा।स्त्रियां अपने दुधमुँहे बच्चों समेत या तो गोली खातीं या अपनी लज्जा के निमित्त कुएँ में जा कूदतीं।शीघ्र ही कुआँ लाशों से पट गया।उसमें किसी के बचने का सवाल ही नहीं था।चारों और लाशों के अंबार लग गए।जब भेदने को कोई सीना न रहा तो मशीनगनें शांत हो गयीं। आज दो दिन बीतने को आए थे। आकाश में...

ऐतिहासिक बाल कथा : वह बालक

        ऐतिहासिक बाल कथा : वह बालक लगभग चार शताब्दी ईसा पूर्व का वह काल।मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र की राजसभा। बड़े-बड़े विद्वान,कुशल योद्धा,चतुर राजनीतिज्ञ, प्रतिभा संपन्न कलाकार व लक्ष्मी के वरद पुत्र धनिकों से सुशोभित सभा में लोग यथास्थान बैठे थे।अमात्य राक्षस व उपमहामात्य शककटार भी अपने स्थान पर विराजमान थे।चारों ओर शस्त्रधारी सैनिक सचेत खड़े थे।तभी द्वार पर शोर हुआ। सभी सचेत हो उठ खड़े हुए।नंदवंशी महापद्मनन्द राजा उग्रसेन ने प्रवेश किया।वे मंथर गति से सिंहासन की ओर बढ़ रहे थे;मानो कोई मदमस्त हाथी अपनी ही धुन में बढ़ा चला जा रहा हो।साथ में चल रहे दीर्घकाय अंगरक्षक उनकी शोभा में चार चाँद लगा रहे थे।उनके सिंहासन ग्रहण करते ही राजसभा में चुप्पी छा गई। महामात्य राक्षस ने उठकर सादर महाराज की जय जयकार की और सभा की कार्यवाही प्रारंभ करने की अनुमति माँगी। अनुमति मिलते ही महामात्य ने इशारा किया।एक व्यक्ति आगे बढ़ा।उसने सम्मान पूर्वक राजा को अभिवादन किया।संभवतः वह एक विदेशी दूत था। उसके इशारे की अनुमति से पीछे खड़े दसियों अनुचर आगे बढ़े।उनमें कुछ के हाथों में बड़े-ब...

कहानी : काउण्टर - तीन

                                           कहानी : काउण्टर - तीन "आप तो बहुत ही अनुशासन वाले व हिसाब-किताब रखने वाले अध्यापक हैं तो कैसे आपकी पॉलिसी कालातीत (लैप्स) हो गई?"मैंने अपने कार्यालय आए पूर्व परिचित शिक्षक से प्रश्न किया जो उक्त कार्य हेतु मेरे समक्ष खड़े थे। "बस सर हो गया।"कह कर उन्होंने बात टाल दी।मैंने भी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करवाईं।उन्होंने काउण्टर पर पैसा जमा किया फिर मेरे पास आकर बैठ गए।संयोगवश उस समय मेरे पास कोई ग्राहक नहीं था।औपचारिक वार्ता के बाद उन्होंने स्वयं बताना शुरू किया- लगभग सात माह पूर्व (जब उनकी पॉलिसी चालू अवस्था में थी)उन्होंने अपने भतीजे को, जो दिल्ली की किसी फर्म में एकाउण्टेण्ट था और छुट्टियाँ बिताने गाँव आया था,को पैसा जमा करने के लिए भेजा था।काउण्टर पर भीड़ होने के कारण युवक लाइन में लग गया।काउण्टर तक पहुँचने में घंटों लग जाने का एहसास उसकी हिम्मत को चुनौती दे रहे थे।पर मरता क्या न करता।  ५ -७ मिनट बीते होंगे कि एक समवयी युवक उसके पास ...