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पितरों की शाँति

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  पितरों की शाँति           @मानव पिण्ड और प्राण का संयोग  किसी विशेष लक्ष्य के लिए है; ज्यों ही कर्तव्य पूर्ण हो जाता है, पिण्ड एवं प्राण का वियोग निश्चित है। शरीर सदा विनाशी है और आत्मा का कभी भी  विनाश संभव नहीं।      ( सांख्य योग ) जिनके प्राण चले गए हों,  उनके लिए विद्वान शोक नहीं करते।   ( श्रीमद्भागवतगीता ) देह से ही सारे संबंध होते हैं,  देह द्वारा मृदा को अंगीकार कर लेने के उपरांत  प्राण स्वतंत्र हो जाता है; अन्य किसी देह से उसका संबंध नहीं रहता,  वह मुक्त है। ममता एवं आसक्ति जितनी सृजनात्मक है  उतनी ही घातक भी; माता-पिता मोहवश संतान का भरण-पोषण करते हैं; संतान भी माता-पिता से प्रेम करती है, और उनकी सेवा करती है; पति-पत्नी आत्मिक प्रेम के कारण एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं; मित्र आदि संबंध भी मोह के धागों से ही जुड़े हैं; वियोग की दशा में यही ममता एवं आसक्ति  निराशा के अंधकार में हमें डुबो सकती है। "जो शरीर जन्म लेते ही हर क्षण परिवर्तित हो रहा है, जो एक क्षण भी स्थायी नहीं है, उसके...

इदं पितृभ्यो नमः

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  इदं पितृभ्यो नमः           @मानव श्रद्धा भाव है और श्राद्ध कर्मकाण्ड; श्रद्धा मन का प्रसाद है; प्रसाद आँतरिक आनंद देता है; पतंजलि ने श्रद्धा को चित्त की स्थिरता या अक्षोभ से जोड़ा है; श्रद्धा की दशा में क्षोभ नहीं होता। भोजन अर्पण शुद्ध श्रद्धा है;  उन्हें मिलता है कि नहीं?  ऐसे प्रश्न महत्वपूर्ण होकर भी श्रद्धा के सामने छोटे हैं। श्राद्ध श्रद्धा की ही अभिव्यक्ति है; क्योंकि हम स्वाभाविक ही पूर्वजों की निन्दा में क्रोध करते हैं। श्रद्धा के कारण ही पत्थर में भी शिव दर्शन की  संभावनाएं हैं; श्रद्धा प्रगाढ़ भाव है; यह अंधविश्वास नहीं है। श्राद्ध की अपनी उपयोगिता है, श्रद्धालु विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोते, ऋग्वेद में श्रद्धा को देवता कहा गया है।  श्रद्धा की अभिव्यक्ति श्राद्ध है; भारतीय परंपरा में श्रद्धा भाव श्राद्ध कर्म है; पिता,पितामह और प्रपितामह के लिए अन्न,भोजन,जल आदि के  अर्पण तर्पण का कर्मकाण्ड है। श्रद्धा है कि अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलता है; वे प्रसन्न होते हैं और सन्तति को समस्त सुख साधन देते हैं; हम ...

श्राद्धकर्म प्रयोजन

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  श्राद्धकर्म प्रयोजन         @मानव यमलोक पृथ्वी लोक से  छियासी हजार योजन दूर है  जो चंद्रमा का उर्ध्व भाग है,  यहीं पर पितृ लोक स्थित है।  पितृपक्ष के सोलह दिनों में  चंद्रमा का उर्ध्व भाग वर्ष के अन्य महीनों की तुलना में पृथ्वी के अत्यंत निकट आ जाता है अर्थात् इस समय पितृलोक  पृथ्वी की कक्षा से निकट होने से पितृगण की ऊर्जा सीधे पृथ्वीवासियों से  आकर्षित होती है; इसलिए इसी अवधि में पूर्वजों को स्मरण करना समुचित माना जाता है।     (गरुड़ पुराण) मनुष्य की आत्मा सूर्य की ऊर्जा से तथा मन चंद्रमा की ऊर्जा से  निर्मित का विस्तृत स्वरूप है, जो सूक्ष्म एवं अविनाशी ऊर्जा है; इस मनस ऊर्जा में मन के साथ तो बुद्धि एवं चित्त की ऊर्जा समाहित रहती है; जब यह ऊर्जा संसार में जन्म लेती है, तो उसके पूर्व कर्म, जो उसकी चित्त रूपी ऊर्जा में संचित रहते हैं, अपने प्रारब्ध को भोगने के लिए मनस ऊर्जा के अंदर उसी प्रकार की प्रवृत्ति को  उत्पन्न करते हैं, और उसी प्रकार की प्रवृत्ति वाले योनि में जन्म लेने के लिए  प्रेरित करते हैं,...

श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ ...

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 ' श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ ...'         @मानव अर्पण,तर्पण और समर्पण  भारतीय संस्कृति के  आधारभूत स्तंभ हैं; आज हम जो कुछ भी हैं,  माता-पिता और पूर्वजों के  आशीर्वाद से हैं, अतः पितृपक्ष आत्म-अस्तित्व और जड़ों से जुड़ने का  पाक्षिक दिव्य महोत्सव है।  सामर्थ्यवान और अनुग्रहशील परम कृपालु पितृसत्ता हम सभी का सर्वथा मंगल करे, हम अपने पूर्वजों के प्रति  श्रद्धा भाव रखें। ' पुनंतु मा पितर: सौम्यास:  पुनंतु मा पितामहा: पुनंतु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा। पुनंतु मा पितामहा: पुनंतु प्रपितामहा: पवित्रेण शतायुषा  विश्वमायुर्व्यश्नवै।।' परिवार की प्रसन्नता देखकर  पितृ प्रसन्न होते हैं। अतः पितृ पक्ष में प्रसन्न रहकर दान-पुण्य करना चाहिए।  ' श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ ...' (जो श्रद्धा से किया जाए,  वह श्राद्ध है।) अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह,  विनम्रता,आदर व श्रद्धा भाव से विधिपूर्वक किया जाने वाला मुक्त कर्म ही श्राद्ध है; यह पितृ ऋण से मुक्ति का  सरल व सहज उपाय है; इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। सनातन में मा...

ॐ पितृ देवतायै नमः

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  ॐ पितृ देवतायै नमः        @मानव वही संस्कृति टिकी रहती है  जो अपनी जड़ों से, अपने परिवार से जुड़ी रहती है। सनातन धर्म में पितरों को  हर मांगलिक अवसर पर  श्रद्धापूर्वक स्मरण करने की  परंपरा है। पितृ पक्ष पूर्वजों को समर्पित समय है   इस पक्ष में पितरों को  प्रसन्न करने, क्षमा माँगने  और पितृ दोष से मुक्ति के लिए प्रयास किए जाते हैं। पितृ पक्ष के माध्यम से  अपने पितरों को प्रणाम करने का, पूर्वजों की पुण्यस्मृति में गङ्गा में स्नान करने का  समय आ गया है; विशेष अनुष्ठान-पूजा द्वारा जहाँ अपनी कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । आधुनिक समाज में व्यक्ति  अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों को भूलता जा रहा है, पितृपक्ष का आयोजन उन्हें याद दिलाने का,  परिवार को जोड़ने का  महत्वपूर्ण माध्यम है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितृदेव धरतीलोक पर आते हैं और सप्रेम अर्पित प्रसाद को ग्रहण करते हैं, प्रसन्न हो आशीर्वाद भी देते हैं; "तर्पण-पिंडदान और श्राद्ध वस्तुतः मृत्यु के बाद का कर्म है!"  ( गरुण पुराण ) जो परिजन पृथ्व...

पितृयज्ञ

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  पितृयज्ञ           @मानव भारतीय संस्कृति मानवता की पोषक है अतः धरती के सभी प्राणियों के योगक्षेम की चिंता करती है।  इसकी सिद्धि के लिए मानव को साधक बनाकर पञ्चयज्ञों का विधान है, जिसमें चेतन ही नहीं जड़ पदार्थों का भी ध्यान रखा गया है। मनुष्य पर जन्म से ही पाँच ऋणों का भार है पञ्चयज्ञ इनसे मुक्ति के  प्रखर साधन हैं। वेदों ने मातृदेवो भव, पितृदेवो भव का उद्घोष किया है; पितृयज्ञ पितृऋण से मुक्ति का उपाय है। इसी भावना की सिद्धि हेतु  भारतीय संस्कृति में पितृपक्ष का विधान है,  जिसमें श्राद्ध कर्म द्वारा  उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। श्रद्धा भाव प्रमुख होने से  इसे श्राद्ध कहते हैं; श्रद्धा से समर्पित भोगों को  पूर्वज भाव रूप में ग्रहण करते हैं। स्थूल के सामान सूक्ष्म जगत भी सत्य है,  जिसे भाव जगत भी कहा जाता है; माता-पिता एवं गुरु स्थूल शरीर के न रहने पर भी सूक्ष्म शरीर से हमेशा जीवित रहते हैं; उनका मार्गदर्शन संबल बनकर सदा हमारे साथ रहता है।  उनकी संतृप्ति के लिए तर्पण एवं दान आदि के द्वारा पितृयज्ञ संपादि...
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  विश्वकर्मा प्रजापति :           @मानव भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि बनाई, इसके निर्माण कार्य का निष्पादन सातवें पुत्र विश्वकर्मा जी को सौंपा; अतः विश्वकर्मा प्रजापति अर्थात सृष्टि के निर्माता हैं " विश्वकर्मा प्रजापति: स सर्जनात् प्रजापति:"। विश्वकर्मा की सर्जनात्मक शक्ति और सृष्टि संरक्षक शिव के साथ तादात्मय उल्लेखनीय है। "विश्वकर्मा रुचिरनिर्माणम्,  विश्वकर्मा शिवमाचरेत्।" ब्रह्मा जी के आदेश पर ही  विश्वकर्मा जी ने सृष्टि का  मानचित्र बनाया था। अतः वे विश्व के प्रथम अभियंता हैं। भगवान विश्वकर्मा का सृष्टि के निर्माता और विधाता के रूप में आह्वान किया जाता है। " विश्वकर्मा त्वमसि धाता,  विश्वकर्मा त्वमसि विधाता।" विश्वकर्मा जी की अन्य कृतियाँ हैं देवाधिदेव शंकर का त्रिशूल, पुष्पक विमान, सोने की लंका, श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका,  पाण्डवों का इंद्रप्रस्थ, व देवी-देवताओं के अस्त्र-शस्त्र। विश्वकर्मा जी को यांत्रिकी  और वास्तुकला विज्ञान के जनक का श्रेय है।    ( ऋग्वेद ) विश्वकर्मा की सर्वव्यापकता,  सर्वज्ञता,शक्ति-संप...