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Showing posts from October, 2024

माटी का दीया

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  माटी का दीया             @मानव जीवन में अनवरत संघर्ष से ही सफलता प्राप्त होती है; इस लड़ाई में हमारी सामर्थ्य से अधिक  हमारे धैर्य की परीक्षा होती है; सामर्थ्य कम हो तो भी अडिग धैर्य  सफलता-सूर्य के दर्शन  करवा ही देता है। दीये एक गहरे सांस्कृतिक  और भावनात्मक इतिहास के वाहक हैं, ये हमारे भीतर बसे  आध्यात्मिक अंधकार को भी दूर करने का निमित्त बनते हैं। मिट्टी की महक और घी या तेल से सिक्त इन दीयों की लौ हमारे मन के हर कोने में  रोशनी की एक नई लकीर  खींच देती है। दीये अपने भीतर आत्मनिर्भरता और सादगी के प्रतीक होते हैं; मिट्टी से बना छोटा सा दीया  असीम ऊर्जा और प्रकाश को प्रकट करता है। इसके जीवन की सरलता,  विनम्रता और शाँति का द्योतक है; जो हमें याद दिलाता है कि बाह्य आडंबर और तड़क-भड़क की तुलना में सरलता एवं सहजता  अधिक स्थायी और प्रिय होती है। दीये का संघर्ष अनोखा है;  वह एक छोटी सी बाती और तेल को साथ लेकर  घनघोर तिमिर से लड़ने को डट पड़ता है। चतुर्दिक व्याप्त अंधकार की  शक्ति असीम है, वह...

रूप चौदस

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  रूप चौदस            @मानव दीपावली के पर्व कृष्ण पक्ष में होते हैं जो अपनी ऊर्जा से  आंतरिक जगत के अंधकार को उजाले में बदल देगा। पर्व की द्वितीय श्रृंखला पर नस-नाड़ियों के जाल से  संचालित शरीर में सद्भाव का चतुर्मुखी दीप  प्रज्वलित करना ही नरक चतुर्दशी है। इससे दीपावली के दिन मनुष्य के रोम-रोम से ऊर्जा की ज्योति जागृत होने लगेगी, रोम-रोम के ऊर्जान्वित होते  ब्रह्मांडीय ऊर्जा भी शरीर में प्रवेश करने लगेगी। रूप चौदस रूपांतरण के आह्वान का त्योहार है; यह रूपांतरण है हमारे तन-मन का, हमारी चेतना का, हमारे घर-परिवार का, हमारे राष्ट्र का और राष्ट्र के धर्म का। प्रत्येक मनुष्य के रूप की  अपनी लक्ष्मी है, उसका अपना वैभव है; जब तक वह लक्ष्मी नहीं जागेगी, तब तक मन के आंगन में  प्रेम का दीप कौन संजोएगा? प्रेम का उजास कहां होगा? इतने बड़े अनुष्ठान के लिए  इतना बड़ा दिन सौगात में दे गए हैं हमारे पूर्वज! और हम अपने चेहरों पर  केवल उबटन ही मलते रह गए। मन का आकाश सितारों से जगमग न हो, तो समझ लो, दीपावली आई और मुँह फेर कर चली भी ग...

धनत्रयोदशी

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  धनत्रयोदशी            @मानव दीपावली का अवसर पाँच पर्वो की नदियों के  सँगम जैसा है; इसमें डुबकी लगाने से  जीवन में स्वास्थ्य,चरित्र एवं बुद्धि-धन की प्रचुरता सदा बनी रहेगी। दीपावली धनतेरस के साथ आती है; सबका धन अलग-अलग है;  कोई सोने-चाँदी को धन मानता है, कोई कलम-दवात को; कोई सुख-भोग के संसाधनों को, कोई मन की शाँति को। लेकिन धनतेरस का संदेश है- 'पहला सुख निरोगी काया'; 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।'  ( महाकवि कालिदास ) धर्म का सर्वप्रमुख साधन तो  हमारा शरीर ही है; लक्ष्मी स्वस्थ देह में और स्वच्छ गेह में ही निवास करती है। धनतेरस अपने परिवेश में  स्वास्थ्य की चेतना को  जगाने का दिन है; स्वास्थ्य ही तो धन है; इसी पर तो रूप की प्रतिष्ठा है। धन-त्रयोदशी के ही दिन आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरी की जयंती मानव को सन्देश देती है कि स्वास्थ्य भी एक धन है।  यदि भौतिक संपदा का  आनंद उठाना है तो यह स्वास्थ्य-धन के अभाव में कभी सँभव नहीं हो सकेगा; इसीलिए स्वास्थ्य एक बड़ी सँपदा है। मन के मंदिर में फिर सुनाई देने लगता है...

अचल होऊ अहिवातु तुम्हारा

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  अचल होऊ अहिवातु तुम्हारा            @मानव त्योहार समाज के प्राण हैं  और ये हम सबके जीवन में  आनंद और ऊर्जा भरने का काम करते हैं। हमारी परंपरानुशील संस्कृति, पर्व,व्रत,त्योहार से  ऊर्जा लेती हुई नित्य नवीन हो बढ़ती चलती है। संस्कृति के इस निर्मल प्रवाह की रक्षिकाएं और पोषिकाएं  हमारी मातृशक्ति है, सभी पर्वों के मूल में परिवार की कुशलता की  आकांक्षा प्रबल होती है;  इनमें सौभाग्य एवं मातृत्व के व्रत-त्योहारों के प्रति स्त्रियों का विशिष्ट उमंग होता है। चंद्रमा मनसो जातः अर्थात्  विराट् पुरुष के मन से चंद्रमा का प्राकट्य हुआ है अतः चंद्रमा मन का प्रतीक है, प्रेम का प्रतीक है; चंद्रमा लालित्य है, मन की प्रसन्नता है और इंद्रियों के लिए प्रकाश है। चंद्रमा एकांत का साथी है,  जो हर रात आकाश में दिव्य आभा के साथ बैठता है; बढ़ती-घटती कलाओं के साथ प्रतिनिशा मुस्कुराता है।  पूर्णिमा के चंद्र का सौंदर्य कवि साहित्यकार को भले आकर्षित करता हो पर विवाहिता के लिए   कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का  चंद्रमा का दर्शन ...

मन की शाँति का पर्व

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  मन की शाँति का पर्व            @मानव शरद पूर्णिमा न केवल एक धार्मिक पर्व है,  बल्कि यह मन की शाँति  और आंतरिक आनंद प्राप्ति का भी अवसर है। इस दिन रात्रि में योगेश्वर श्रीकृष्ण जी ने  गोपियों के सँग महारास रचाया था और सत्पात्रों में विशेष अनुकंपा बाँटी थी। योगेश्वर श्रीकृष्ण का  आशीष पाने के लिए इस दिन के विविध उपायों में कोजागरी व्रत सर्वश्रेष्ठ व्रतों में से है।        ( स्कंद पुराण ) यह महालक्ष्मी की उपासना का भी पर्व है; इस समय महालक्ष्मी  विचरण करती हैं। महालक्ष्मी प्रसन्न होकर  आराधना करने वालों के  मन को शाँति प्रदान करती हैं उन्हें धनधान्य से परिपूर्ण करती हैं।  ( सनत कुमार संहिता ) शरद पूर्णिमा पर ध्यान और साधना करने से  मन में शाँति और संतोष की  अनुभूति होती है। यह आत्मा को उच्चतर स्तर पर पहुँचाने का एक साधन है; सकारात्मक विचारों को  अपनाने से मानसिक शाँति मिलती है। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा  सोलह कलाओं से परिपूर्ण होने के साथ पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है। इस दि...

विजयदशमी

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  विजयदशमी         @मानव मानसिकता से रावण को अर्थात रावण की बुराइयों को  मारने का प्रण ही  विजयदशमी है। रावण की अच्छाइयाँ हैं कि वह बलवान है, जो शंभू सहित कैलाश उठा सकता है; कोई बलवान यदि बुद्धिमान न हो तो बल संघर्ष करता है।  जबकि रावण बुद्धिमान भी है। रावण विद्यावान भी है रावण तपवान भी है, और धनवान भी बहुत है; धनवान होने के साथ  धर्मवान होना चाहिए; जो रावण से अछूता है। अच्छाइयों के अतिरिक्त उसमें कमजोरियाँ भी हैं वह शीलहीन है,; रावण नीति का दावा तो करता है, पर नीतिवान है नहीं। रावण धर्मवान भी नहीं है भक्तिवान भी नहीं है; और रूपवान भी नहीं है; सीमा से बाहर जाकर रूप पर रीझना, उस पर आक्रमण कर देना  रावण की कमजोरी है; रूप पर आक्रमण तो अरूप ही करता है; रूप तो रूप की पूजा करता है। विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर  गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं। 'जड़ चेतन गुन दोषमय  बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय  परिहरि बारि बिकार।।''   ( रामचरित मानस ) रावण ऐसा नहीं कर...

हे नारायणी!

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  हे नारायणी!         @मानव शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत् की माता!  प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि ! विश्व की रक्षा करो। देवि!तुम्हीं चराचर जगत् की  अधीश्वरी हो। तुम इस जगत् का एकमात्र आधार हो; क्योंकि पृथ्वीरूप में तुम्हारी ही स्थिति है। देवि ! तुम्हारा पराक्रम  अलंघनीय है। तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करती हो। तुम अनन्त बलसम्पन्न  वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्व की कारणभूता परा माया हो। देवि!तुमने समस्त जगत् को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की  प्राप्ति कराती हो। देवि!सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं,  वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब!एकमात्र तुमने ही  इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तुम तो स्तवन करने योग्य  पदार्थों से परे एवं परा वाणी हो।  बुद्धिरूप से सब लोगोंके हृदयमें  विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली हो। कला,काष्ठा आदि के रूपसे  क्रमशः परिणाम ...

मातृरूपेण संस्थिता

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  मातृरूपेण संस्थिता          @मानव भारतीय संस्कृति में शक्ति उपासना का सर्वोच्च स्थान रहा है; शक्ति की उपासना सिंधु घाटी से लेकर नील घाटी तक फैली हुई थी। प्राचीन भारत में शिल्प आदि कलाओं के माध्यम से मातृ शक्ति का स्तवन किया गया है, वैदिक काल से वर्तमान तक  इसका वैभव प्रकट होता हुआ है। भारतीय संस्कृति एवं परंपरा में मातृशक्ति पर व्यापक रूप से विमर्श हुआ है; शास्त्र विधान के अनुसार  प्रतिमा की रचना होने पर ही  वह पूज्य और आराध्या होती है, फलतः उपासना के साथ-साथ  प्रतिमा या शिल्प कला का भी विकास हुआ है। ऋग्वेद के अंतर्गत श्रीसूक्त के रूप में  मातृशक्ति उपासना का  विस्तृत स्वरूप प्राप्त होता है; वैदिक साहित्य और तत्कालीन समाज में  प्रचलित शक्ति की उपासना परंपरा का संकेत देवमाता अदिति,उषा,  पृथिवी,वाक् यमी आदि के उल्लेख से होता है।  औपनिषदिक ग्रंथों में  काली-कराली (मुण्डकोपनिषद्), उमा- हैमवती(केनोपनिषद्)  आदि का वर्णन है।  भद्रकाली,भवानी,दुर्गा  इत्यादि देवियों के नाम सांख्यायन, हिरण्यकेशी गृहसू...

भारतीय लोकजीवन,देवी उपासक

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  भारतीय लोकजीवन,देवी उपासक          @मानव माँ प्रत्येक जीव की आदि अनादि अनुभूति है; हम सबका अस्तित्व माँ के कारण है; माँ न होती तो हम न होते।  माँ स्वाभाविक ही दिव्य हैं,  देवी हैं, पूज्य हैं, वरेण्य हैं, नीराजन और आराधन के योग्य हैं।  मार्कण्डेय ऋषि ने  " या देवी सर्वभूतेषु  मातृरूपेण संस्थिता बताकर  नमस्तस्यै,नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमोनमः " कहकर   { दुर्गा सप्तशती(अध्याय 5) } अनेक बार नमस्कार किया है। माँ का रस,रक्त और पोषण ही प्रत्येक जीव का मूलाधार है;  ऋषियों ने इसीलिए माँ को देवी जाना और देवी को माता कहा। माँ के निकट होना  आनंददायी है; निकटता के लिए प्रयुक्त 'उप' शब्द से 'उपनिषद', उप से उपासना भी बना है; उपनिषद् का अर्थ है- ठीक से निकट बैठना।   उपासना का अर्थ भी निकट होना है। उपवास का भी अर्थ  'उप-वास' निकट रहना है;  उपवास का अर्थ दिव्यता की निकटता है; दिव्यता की निकटता से  भोजन बेमतलब हो जाता है। उपासना और उपवास एक जैसे हैं; व्रत का अर्थ नियम पालन है; "नियम से भोजन करने क...

अन्तस् की देवी

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  अन्तस् की देवी         @मानव शुंभ ‘आत्म-संदेह’ और निशुंभ ‘दूसरों पर संदेह का’ प्रतीक है; जब व्यक्ति अपने आप पर  संदेह करता है, तो वह दूसरों पर भी संदेह करने लगता है। आत्म-संदेह के वातावरण में  कोई भी रचनात्मक गतिविधि नहीं हो सकती, और जब दूसरों पर संदेह हो  तो कोई भी महत्वपूर्ण  उपलब्धि नहीं हो सकती।  संदेह अच्छे गुणों और प्रबंधन क्षमता को दबा देता है, जिससे हमारे और आसपास के लोगों के लिए दुख पैदा होता है। जब हम संदेह की  मनोस्थिति में होते हैं और किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं, जिसकी धारणा गलत होती है तो वे हमारे संदेह को  मान्यता देकर मजबूत करते हैं, यही धूम्रलोचन है। जो प्रभावी ढंग से संवाद नहीं कर सकता और बिना सोचे-समझे हर कार्य करता है;  दूसरा बिना सिर (मस्तिष्क) के  वास्तविक संवाद नहीं कर सकता, क्योंकि सभी संवाद सिर के माध्यम से होते हैं; अतः जब ज्ञान और कर्म अलग हो जाते हैं तो दोनों हमारे भीतर  आसुरी वृत्तियों को जन्म देते हैं; ये दोनों प्रवृत्तियाँ ही चण्ड और मुण्ड हैं। जो हमारे हर कोश में विद्यमान है, वह...

संबंधों का मूल

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  संबंधों का मूल           @मानव श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है;  छोटे हों या बड़े, सभी दिवंगत आत्माओं के लिए श्राद्ध होता है।  जीते जी छोटे व बड़ों के लिए हम अपने स्नेह,श्रद्धा व सम्मान का जितना अधिक उपयोग करेंगे, उतना हमें छोटों से सम्मान,  बड़ों से आशीर्वाद और पूर्वजों से शक्तियाँ मिलेंगी। हर संबंध की एक भौतिक पहचान या नाम होता है, यह सामने वाले पर निर्भर है  कि उसका संबंध दूसरे के साथ कैसा होगा।  दो आत्माओं के बीच का  संपर्क सम्बन्ध है, जो हमारे स्वयं के साथ संबंध की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। आत्मा के साथ हमारा संबंध  प्रेमपूर्ण तब होगा, जब स्वयं का अपने अंतरात्मा के साथ  संबंध प्रेममय होगा। प्रेम हमारी अंतरात्मा का मूल गुण या स्वभाव है; प्रेम करना व पाना; दूसरों के साथ संबंध स्थापित करने का अर्थ है, दूसरों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना; दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जब हम बाहरी और आंतरिक दोनों आयामों को अलग कर देते हैं, तो हमारे संबंध सुंदर नहीं बन पाते हैं। हमें देखना होगा कि क्या हम अच्छे शब्दों का  चयन करने...