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माँ भारती

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  माँ भारती             @मानव माँ शक्ति स्वरूपा है; इसीलिए मातृशक्ति को  पूजनीय माना गया है; भगवती के स्वरूप में देवी माँ जीवन की सफलता और उद्धार का हेतु हैं। माता का आह्वान हर सुख-दुख में किया जाता है, जिससे समस्त विघ्न  प्रभावहीन होते हैं। माँ की उपस्थिति कल्याण और सौभाग्य सूचक है; मानव मात्र के लिए माता आराध्य एवं स्तुत्य हैं। शक्तिहीन व्यक्ति, शक्तिहीन समाज या शक्तिहीन राष्ट्र अधिक समय जीवित नहीं रहते इसलिए शक्तिरूप में विद्यमान माता के श्रीचरणों का  आश्रय आपेक्षित है। जो माता की महत्ता से दूर है, वह अभागा इस धरा पर जड़वत है। माता की प्रसन्नता पुत्र के भाग्योदय में सक्षम है। भारत माता के सपूत शक्ति के रूप में उनकी आराधना उत्पत्ति काल से करते हैं। भारत माता स्थूल रूप में  एक दिव्य शक्ति हैं, जो देवलोक से उतरकर  पृथ्वी की गोद में विराजमान हैं। पृथ्वी माता भी गौ माता, तुलसी माता, गायत्री माता और वेदमाता की तरह लोक कल्याण हेतु अवतरित हैं। पृथ्वी माता की पुत्री हैं, माँ भारती! माँ भारती के अस्तित्व को सभी पुरानी सभ्यताएँ आज भी स...

शिव-शक्ति

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  शिव-शक्ति              @मानव भारतीय साँस्कृतिक चेतना में शिव और शक्ति अस्तित्व की दो ध्रुवीय धाराएँ हैं; जिन्हें अलग-अलग देखें  तो सँसार का कोई भी रहस्य  पूरा नहीं हो पाता। शिव और शक्ति मिलकर  सृष्टि का अखण्ड राग रचते हैं; शिव का मौन यदि समाधि है  तो शक्ति उसकी स्पंदित श्वास। जड़-चेतन सभी में यही शिव-शक्ति  यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देंगे; समाधिस्थ शिव शुद्ध चेतना हैं- निराकार,निर्विकार,निष्क्रिय। जबकि शक्ति ही वह गति है  जो इस चेतना को रूप,रस  और रंग देती है, शक्ति ही है जो निराकार में आकार भरती है, शून्य में सँसार गढ़ती है।  'अर्धनारीश्वर' कला का ही प्रतीक नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड के गहरे रहस्य और परम सत्य की अभिव्यक्ति है कि सृष्टि तभी संभव है जब दोनों एक-दूसरे में समाहित हों। प्रकृति का सूत्र है- गति और स्थिरता, विचार और क्रिया- जब तक दोनों का समन्वय न हो, कोई भी पूर्ण नहीं। जब हम केवल 'शिव' बन जाते हैं, अर्थात स्थिर और निष्क्रिय,  तो जीवन जड़ हो जाता है; और जब केवल 'शक्ति' बन जाते हैं अर्थात मात्र गत...

सपनों के वाहक

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  दुर्गा पूजा पण्डाल सपनों के वाहक              @मानव दुर्गापूजा पण्डाल अपनी अद्वितीय थीम व अद्भुत निर्माण कला से  जनजीवन में आनंद का  नवसंचार ही नहीं करते,  बल्कि मानस पटल पर  सामाजिक उत्तरदायित्व,  समावेशिता व जागरूकता की अमिट छाप छोड़ते हैं। ये लोगों को हँसाते हैं, रुलाते हैं, भावनाओं में बहाते हैं,  देश-दुनिया का  हाल-हकीकत बताते हैं,  सपनों की दुनिया में ले जाते हैं, सुनहरे भविष्य की आस जगाते हैं, समृद्ध कला संस्कृति व उसकी वर्तमान स्थिति से  अवगत कराते हैं। ये महाकाल से बुर्ज खलीफा,ह्वाइट हाउस तक की सैर भी कराते हैं; दुनियाभर में गहरा रहे  संकटों को लेकर सावधान करते हैं।  पण्डाल के विषय अधिकारों का एहसास कराते हैं और अन्याय के विरुद्ध  आवाज उठाना भी सिखाते हैं। पण्डाल के हर रङ्ग खुद में एक भावना समेटे हैं;  इनमें प्रेम की गरमाहट है,  विरोध की आग है, दृढ़ विश्वास और साहस है  और आशा की चमक भी है;  क्योंकि रङ्ग जीवन की धड़कन हैं। रङ्गों में निहित भावनाओं को  पण्...

देवत्व के स्त्रैण रूप का उत्सव

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  नवरात्र पर देवत्व के स्त्रैण रूप का उत्सव                @मानव नवरात्र समर्पित है ईश्वर की स्त्री प्रकृति को! जिस पर्व पर मुख्य रूप से देवी या देवत्व के स्त्रैण रूप की पूजा होती है; एकमात्र भारत की सँस्कृति ही है, जहाँ स्त्री की पूजा होती है।  भारतीय सँस्कृति ने सदा  नारी को जीवन के सर्वशक्तिशाली आयाम के रूप में प्रस्तुत किया है; मृतप्राय शिव की छाती पर खड़ी काली का स्वरूप हमें आगाह करता है कि पौरुष तब तक शव है,  जब तक कि उसे स्त्री से  शक्ति नहीं मिलती। शक्ति का अर्थ है ऊर्जा; जो ऊर्जा परमाणु से कार्य कराती है, वही ऊर्जा ब्रह्माण्ड से कार्य कराती है; इसी ऊर्जा को हमेशा स्त्रैण रूप में पहचाना जाता है। स्त्रैण को दर्शाने वाला मूल शब्द 'री' था, जो अस्तित्व की देवी माँ को दर्शाता है और शब्द 'स्त्री' का आधार है; 'री' शब्द का अर्थ गति,  सँभावना या ऊर्जा है; यह महिला से सँबंन्धित नहीं है। महिला होने का सँबंध शरीर से है; स्त्रैण होना शरीर का नहीं, उससे कहीं अधिक है; स्त्रैण प्रकृति को कमजोरी समझने के कारण स्त्रियाँ पुरुषों...

पूर्वजों का स्मरण

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  पितृ विसर्जन अमावस्या पर, पूर्वजों का स्मरण               @मानव पितृपक्ष में दिवंगत कुटुम्बजनों का स्मरण करने को श्राद्ध कहा जाता है। "श्रद्धा” की केन्द्रीभूत चेतना को श्राद्ध कहा जाता है।     (गरुण पुराण) पूरे सँसार में अपने पूर्वजों के स्मरण करने और श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने की परंपरा है; लेकिन भारत में अपने पूर्वजों के स्मरण की  यह पितृपक्ष की अवधि  व्यक्तित्व निर्माण, कुटुम्ब महत्ता और प्रकृति से समन्वय की  अद्भुत अवधि है। पश्चिमी चिंतन केवल वाह्य जगत अर्थात भौतिक सृष्टि तक सीमित है जबकि भारतीय चिंतन  लौकिक से अधिक  अलौकिक सृष्टि तक व्यापक है। विकास के लिये जितना जोर वाह्य शक्ति और साधनों पर दिया जाता है उससे अधिक आँतरिक ऊर्जा के सँचार पर दिया जाता है।  पितृपक्ष में सूर्योदय से सूर्यास्त तक की  पूरी दिनचर्या आंतरिक ऊर्जा जाग्रत करने  और आरोग्य शक्ति अर्जन की अद्भुत प्रक्रिया है। इसके कर्म काण्ड कुटुम्ब समन्वय और प्रकृति से समन्वय बनाकर पर्यावरण सँरक्षण के निमित्त हैं। पितृपक्ष के कर्मकाण्ड से...

श्राद्ध कर्म

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  श्राद्ध कर्म             @मानव पितृपक्ष में पितरों के निमित्त किया जाने वाला श्राद्ध और तर्पण कर्म पूरी श्रद्धा भाव से हो; जल्दबाजी,क्रोध या आवेश में किया गया श्राद्ध कर्म निष्फल होता है। वेदाध्ययन से ऋषियों का, होम से देवताओं का, श्राद्ध और तर्पण से पितरों का सत्कार होता है।       (मनु स्मृति) ऋषियों से पितर, पितरों से देवता और मानव उत्पन्न हुए हैं; द्विजातियों का देव कर्म से पितृ कर्म विशेष है, क्योंकि देवकर्म पितृ कर्म का सदा परिपूरक है। न केवल अपने पितरों का अपितु हमारे सगे सँबंधियों, अथवा जिनसे भी हमारा स्नेह रहा और वो अब इस सँसार में नहीं हैं, तो हम उनके निमित्त श्रद्धा भाव से पिण्डदान तर्पण आदि कर सकते हैं। चतुर्दशी को उसका श्राद्ध होता है, जिसकी मृत्यु किसी दुर्घटना, युद्ध में शहीद हुए अथवा शस्त्र आघात से हुई हो। जिनके मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो उनका श्राद्ध कर्म अमावस्या को तथा ज्ञात और अज्ञात सभी का श्राद्ध और तर्पण अमावस्या को होता है। पितृ कर्म में शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्न का समय श्रेष...

सृजन के अधिपति देव

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विश्वकर्मा जयन्ती पर, सृजन के अधिपति देव               @मानव भगवान विश्वकर्मा, निर्माण,वास्तुकला,  शिल्पकला,याँत्रिकी एवं तकनीकी कौशल के देवता हैं। वे ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं  और सृष्टि के प्रथम वास्तुकार होने से उनकी गणना पंचदेवों में की जाती हैं। वे दिव्य निर्माणों के अधिपति हैं स्वर्ग लोक,इंद्रपुरी  अमरावती,पुष्पक विमान,  द्वारका नगरी,इंद्र का वज्र,  शिवजी का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र और कुबेर का पुष्पक रथ भी इनके निर्माण माने जाते हैं। उनकी सुंदर,टिकाऊ कलात्मकता बताती है कि कोई कार्य  छोटा या बड़ा नहीं होता,  यदि उसे पूरी निष्ठा और कुशलता से किया जाए। यदि ईमानदारी,लगन और नवाचार के साथ कार्य करें, तो इष्टदेव भी निर्माण में सहायक होते हैं। निर्माण केवल भौतिक नहीं,  बल्कि मानसिक,सामाजिक  और साँस्कृतिक भी हो तो उनकी कृपा से कार्यों में श्रेष्ठता,कलात्मकता और तकनीकी दक्षता की  प्राप्ति होती है। भगवान विश्वकर्मा जी का  देवताओं के साथ समन्वय  सँदेश देता है कि यदि हम  समन्वय,योजना और ...