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Showing posts from October, 2025

अनुभूति छठ की!

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  छठ पर, अनुभूति छठ की!            @मानव कार्तिक मास पवित्रतम मास है; कार्तिक शुरू होते ही  हवाओं में हल्की-सी ठण्ड का आभास और तन-मन में उस ठण्ड को  समेटने की ललक बढ़ जाए  तो समझिए कि छठ आ गया। घास पर ओस की बूँद की चमक, ऐसे वातावरण में दूर कहीं  जब छठ का कोई गीत सुनाई दे जिसे सुनते ही रोम-रोम घर पहुँचने को मचलने लगे  तो समझिए कि छठ आ गया। केले की गहर गदराने लगे,  अमरूद,शरीफा डाल पर इतराने लगे,  समझिए कि छठ आ गया।  छत पर बैठकर गेहूँ सूखने की प्रतीक्षा होने लगे और बाजार में रास्ते के दोनों तरफ सुपली,दउरा, फलों के मनोहारी दृश्य दिखने लगें, तो समझिए कि छठ आ गया। रेलवे स्टेशन पर घर पहुँचने को बेचैन खड़ी-बैठी कतारें और सब राहें घर की ओर  मुड़ने लगें तो समझिए कि छठ आ गया। छठी मैया से घर दुवार परिवार की  कुशलता की निर्मल कामना को अपने अँचरा में बांध कर  जब घर की मातृ शक्ति छठ पर्व की तैयारी में जुटती है तो लगता है  साक्षात् भवानी ही निर्जला उपवास में बैठकर  चारों दिन अनुष्ठान कर रही हों, गुड़ की ...

प्रकृति की प्रार्थना

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  छठ पर, प्रकृति की प्रार्थना                   @मानव वर्ष में एक दिन के लिए  'पर्यावरण दिवस' मनाने वाली पश्चिमी सँस्कृति के लिए  छठ महापर्व अपने आप में  एक शिक्षाप्रद महापाठ है। यह सँसार को मनुष्यता के  बुनियादी सरोकार का बोध करा कर भारतीय सँस्कृति को अँगीकृत करा सकेगा। छठ-पर्व अद्वितीय है; छठ प्रकृति की आराधना का उत्सव है!  कृतज्ञ होने का, परमार्थ, संस्कार का उत्सव है छठ। छठ का महापर्व मनुष्य और प्रकृति के  सनातन तादात्म्य का  पवित्रतम साक्ष्य है; अतःसृष्टि का प्राचीनतम पर्व है। छठ में जल में खड़े होकर  डूबते और उगते उस सूर्य की आराधना होती है, जो चराचर जगत का आधार है। जल और सूर्य से ही जीवन है; जीवन बना रहे, इस भाव की कृतज्ञता बनी रहे, मन में विनम्रता बनी रहे,  छठ का महापर्व हमें यही सिखाने प्रति वर्ष आता है। छठ महापर्व मनुष्य के अपने अंतर्मन में  प्रकृति को साधने की रहस्यमयी प्रक्रिया है। इसका अनूठा आध्यात्मिक आनंद है; जिसे सहभागिता से ही अनुभव किया जा सकता है। छठ एक त्योहार भर नहीं ह...

दीपावली की प्रतीकात्मकता

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  दीपावली पर, दीपावली की प्रतीकात्मकता                  @मानव दीपावली किसी के लिए  सम्पन्नता का प्रतीक है, किसी के लिए मिलन का  और किसी के लिए स्मृति का। बूढ़ी माँ जब पुराने दीए साफ करती है तो हर दीए में उसे बीते वर्षों की परछाई दिखती है; अब वह दीया जलाती है तो उसमें एक तरह की मौन प्रार्थना होती है कि उजाला केवल घर का न हो, मन का भी हो।  साहित्य में दीपावली केवल एक दृश्य नहीं, एक प्रतीक  है-प्रकाश का,  ज्ञान का, सत्य का। किसी ने इसे राम के  अयोध्या लौटने का उत्सव कहा किसी ने आत्मा की विजय का, किसी ने प्रेम के पुनर्जन्म का, पर सबका सार एक ही रहा- अँधकार से प्रकाश की ओर,  भय से विश्वास की ओर,  बाह्य से अँतर की ओर यात्रा। सँस्कृति के स्तर पर  दीपावली हमें यह सिखाती है कि उत्सव केवल प्रदर्शन नहीं, सँवेदना है। यह पर्व हमें जोड़ता है- परिवारों से, पड़ोसियों से और यहाँ तक कि  अजनबियों से भी। किसी और के द्वार एक दीप रख देना, यह बताना है कि हम साथ हैं, हम एक ही प्रकाश में जी रहे हैं; यही भारतीयता ...

दीपावली का सन्देश

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  दीपावली पर, दीपावली का सन्देश              @मानव दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का  आलोकित उत्सव है,  अँधकार से सँवाद करने की कला है और निराशा के बीच आशा का दीप जलाने का नाम है। दीपावली का उत्सव  केवल लक्ष्मी की आराधना नहीं है, बल्कि श्रम और सौंदर्य,  करुणा और स्मृति, उत्सव और साधना का सँगम है। इस दिन हर व्यक्ति, चाहे गरीब हो या अमीर,  कुछ न कुछ सजाता है- अपना घर,अपना मन या अपनी आशा। यह सजावट केवल भौतिक नहीं,  मनोवैज्ञानिक भी है; यह सजाने,सँवारने, सँजोने का उत्सव है जैसे हम अपने भीतर के  अस्त-व्यस्त भावों को भी  दीपों की पंक्तियों में सजा दें। जो दीप जलता है, वह बुझता नहीं, वह हृदय में उतर जाता है। दीपावली का गहनतम अर्थ यही है भीतर का दीप जलाना। यह भीतर का दीप तब तक नहीं जलता, जब तक हम अहंकार की  कालिख न मिटा दें, ईर्ष्या का धुआँ न हटाएँ और स्वार्थ की ठंडी राख को  न झाड़ दें। जब भीतर की सफाई हो जाती है, तब हर मन स्वयं दीप बन जाता है, जैसे हर घर में नहीं, हर आत्मा में दीपावली  ...

दीपावली के निहितार्थ

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  दीपावली पर, दीपावली के निहितार्थ               @मानव कार्तिक अमावस्या पर  समूचा भारत जैसे एक साथ साँस लेता है- धीरे,स्थिर,श्रद्धा से भरा हुआ।  गाँव की कच्ची गलियाँ हों  या महानगर की अट्टालिका,  हर जगह कोई न कोई दीप  किसी स्मृति, किसी प्रार्थना, किसी सपने के नाम जलता है। यह रोशनी बाहर जितनी दिखती है, भीतर उतनी ही उतरती है,  क्योंकि दीपावली बाहरी उजास से अधिक  भीतर के अँधेरे को पहचानने और उसे प्रेमपूर्वक  आलोकित करने की प्रक्रिया है।  कवियों ने हमेशा दीपावली को प्रकाश और अँधकार के  सँघर्ष के रूप में देखा है, पर यह सँघर्ष नहीं, सँवाद है। अँधकार प्रकाश का शत्रु नहीं, उसका आवश्यक आधार है, बिना अमावस्या के चाँद का अर्थ अधूरा है, दीप का सौंदर्य तभी खिलता है, जब उसके चारों ओर घना अँधेरा हो। जीवन भी ऐसा ही है; अँधकार हमें प्रकाश का  मूल्य सिखाता है, दुख हमें आनंद की गरिमा दिखाता है और हानि हमें प्रेम की  गहराई समझाती है। जब साँझ उतरती है और पहली फुलझड़ी जलाती है तो केवल चिंगारियाँ नहीं उठतीं, वह...

माटी का दिया

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दीपावली पर, माटी का दिया             @मानव मिट्टी के दीये का  अपना सौंदर्य है; वह भले ही छोटा हो, पर उसका प्रकाश सबसे कोमल और सबसे सच्चा होता है।  उसमें मनुष्य का परिश्रम है,  धरती की गंध है और आस्था की गर्मी है; वह दीप जब जलता है, तब लगता है जैसे किसी किसान की हथेली, किसी माँ के नेत्र, किसी बच्चे की हँसी- सब मिलकर उस लौ को  थरथरा रहे हों। यही मिट्टी का दीया जीवन की सबसे गहरी प्रतीक-कथा कहता है कि जो झुकता है, वही जलता है, जो मिटता है, वही प्रकाशित होता है।  ✍️मनोज श्रीवास्तव

चेतना जागृति का पर्व

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  धनत्रयोदशी पर, चेतना जागृति का पर्व          @मानव धनतेरस केवल धन का नहीं, आरोग्य और अमरत्व की चेतना जागृत करने वाला दीप पर्व है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है  कि सच्चा धन सोना नहीं  बल्कि स्वस्थ तन और शाँत मन है। अमृत का कलश उस दिव्यता का प्रतीक है,  जो जीवन में संतुलन और स्वास्थ्य लाता है। जब यमराज के नाम दीपक जलता है तो वह केवल मृत्यु पर  विजय नहीं बल्कि जीवन के प्रति  कृतज्ञता का प्रतीक बनता है। जग के पालनहार देव विष्णु के चौबीस अवतारों में से द्वादशवाँ धन्वंतरि, आरोग्य के पिता का  अवतरण दिवस है आज। जो समुद्र मंथन के दौरान  जनकल्याण की भावना से  अमृत कलश सहित  अवतरित हुए। धन्वंतरि आरोग्य प्रदाता देवता हैं दीर्घायु प्राप्ति के लिए  जिनका पूजन होता है। धनतेरस का दीप यही संदेश देता है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, यही चेतनता है। “आरोग्यं परमं भाग्यं,  स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्”  ✍️मनोज श्रीवास्तव

आस्था की अभिव्यक्ति

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  करवा चौथ पर, आस्था की अभिव्यक्ति             @मानव कार्तिक मास कृष्ण चतुर्थी को जब शाम का सूरज डूबता है, तो भारत के कोने-कोने में सजी-सँवरी महिलाएँ माथे पर लाल बिंदी,  हाथों में मेंहदी, आँखों में इंतज़ार और होठों पर एक ही सवाल  'चाँद निकला क्या?' के साथ थाली में दीप,छलनी और करवा सजाकर चाँद के दर्शन करती हैं।  यह दृश्य भारतीय सँस्कृति की सुंदरता का प्रतीक भी है  और उसकी गहराई में छिपे  सामाजिक अर्थों का आईना भी। करवा चौथ का व्रत  अपने पति की दीर्घायु के लिए सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला सुहाग की स्थिरता और पति की लंबी उम्र के लिए है, जहाँ दिनभर की तपस्या के बाद जब चाँद निकलता है तो पत्नी छलनी से पति का  चेहरा देख कर व्रत तोड़ती है। करवा चौथ का व्रत स्त्री के समर्पण,त्याग और सहनशीलता का उत्सव बन गया है; अतः यह व्रत सिर्फ प्रेम और आस्था की अभिव्यक्ति है। भारतीय समाज में स्त्री का जीवन 'सुहाग' की खुशी, उसकी प्रतिष्ठा और उसकी पहचान से जुड़ा है। कभी यह व्रत गाँव में स्त्रियों के बीच अपनापन और सहयोग का प्रतीक था; महिलाएँ ...

राम-आदर्श के स्थापक

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  वाल्मीकि जयन्ती पर, राम-आदर्श के स्थापक                  @मानव वाल्मीकि महर्षि थे और नारद देवर्षि; वाल्मीकि महर्षि बनने की  प्रक्रिया में हैं, किंतु उनका साक्षात सँपर्क  देवर्षि नारद से है; वाल्मीकि रामायण का आरंभ ही नारद-वाल्मीकि सँवाद से है। वाल्मीकि तपस्वी हैं, परंतु नारद बहुगुणी; वे तपस्या,स्वाध्याय और वाणी मर्मज्ञ हैं। तप जिज्ञासा उत्पन्न करता है, स्वाध्याय उसका निदान;  फिर उसे वाणी मिल जाए  तो मौन मुखर हो उठता है; वाल्मीकि के मानस से  रामकथा की गंगोत्री का  प्रवाह प्रस्फुटन हुआ। वाल्मीकि श्रीराम समकालीन थे; उन्होंने रामायण की रचना की और सीता परित्याग पर उन्हें आश्रय दिया। वे लव और कुश के शिक्षक हुए और उन्हीं के निर्देशन में  कुशीलव की परंपरा और रामायण का गायन  आरंभ हुआ। वाल्मीकि ने अपना परिचय दिया- हे रामचंद्र! मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूँ। प्रचेतसोहं दशमः  पुत्रोराघवनंदन।  (अध्यात्म रामायण,  उत्तरकाण्ड) प्रचेता वशिष्ठ,भृगु व नारदादि के भाई थे। प्रचेतसं वशिष्ठं च भृगुं नारद...

रस रात्रि - रास रात्रि

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  शरद पूर्णिमा पर, रस रात्रि - रास रात्रि                @मानव आश्विन मास की पूर्णिमा  शरद पूर्णिमा, कोजागरी, नवान्न पूर्णिमा अथवा कौमुदी पूर्णिमा आदि नामों से जाना जाता है। यह पर्व इतिहास,पुराण,धर्म, अध्यात्म सहित अनेक साँस्कृतिक सँदर्भों से युक्त है; इस अवसर पर रात्रि-जागरण एवं भगवती लक्ष्मी तथा ऐरावत हाथी सहित  देवराज इंद्र की पूजा होती है।       (लिंगपुराण) यह भगवती लक्ष्मी के  प्राकट्य का पर्व भी है; इस रात्रि में माता लक्ष्मी  ‘कौन जागता है’ ऐसा प्रश्न करती हुई विचरण करती हैं इसलिए यह पर्व ‘कोजागरी’  अथवा ‘कोजागरा’ भी कहलाता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने  गोपकन्याओं को वचन दिया था कि ‘मयेमा रंस्यथ क्षपाः’ हे गोपियों तुम्हें मेरे साथ  रमण का अवसर प्राप्त होगा। अपने वचन के अनुसार  भगवान ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में भक्तिमती गोपियों को भगवान ने अपने अप्राकृत,  अलौकिक विहार का आनंद प्रदान किया। पूर्णकाम भगवान ने  योगमाया का आश्रय लेकर  प्रेममयी गोपियों को महारास के माध्यम से ज...

आत्मविजय-धर्म विजय

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  दशहरा पर्व पर आत्मविजय-धर्म विजय                @मानव विजयादशमी आत्मशुद्धि का महायज्ञ है; यह पर्व हमें आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करता है। श्रीराम-रावण युद्ध मानव-चेतना में घटित होने वाला सत्य और असत्य का, धर्म और अधर्म का तथा प्रकाश और अँधकार का, शाश्वत द्वंद्व है। विजयदशमी विजयगाथा का शाश्वत महापर्व है; यह केवल अधर्म पर धर्म की  विजय का द्योतक नहीं,  अपितु मानव जीवन की  आत्मयात्रा को दैदीप्यमान करने वाला प्रमुख स्तंभ है। सँगच्छध्वं सँवदध्वं सँ वो मनांसि जानताम् (ऋग्वेद का वाणी-विभूषित सूक्त) विजयदशमी की सामूहिक चेतना का अमर सँदेश है। यह महापर्व हमें स्मरण कराता है कि जब मनुष्य धर्म से  विमुख होकर इंद्रियों के  मोहपाश में बंध जाता है, तब उसका रूप रावण जैसा हो जाता है। जब वही इंद्रियाँ सँयम और सदाचार के  अधीन हो जाती हैं, तब मनुष्य दशरथ बनकर  अपने हृदय-आँगन में  ज्ञानरूपी श्रीराम,  वैराग्यरूपी लक्ष्मण,  विवेकरूपी भरत और विचाररूपी शत्रुघ्न को  प्रतिष्ठित करता है। श्रीराम के धनुष की टंकार ...

नवरात्र के निहितार्थ

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  नवरात्र के निहितार्थ               @मानव आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से शारदीय नवरात्र में देवी भगवती की  उपासना के माध्यम से  आत्मिक शक्ति,मानसिक शाँति और शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने का एक अलभ्य अवसर होता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति की प्रतीक हैं,भगवती देवी दुर्गा! जो सँपूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारभूत और क्रियात्मक शक्ति के रूप में आराधित होती हैं। माता की  उपासना से भक्तों को आत्मिक बल,  जीवन में संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है। नवरात्र के नौ दिनों में किया गया तप और साधना  सभी नकारात्मक शक्तियों से मुक्त कर कल्याणकारी जीवन की ओर प्रेरित करता है। यह कालखंड आत्मिक उत्थान और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध है। मानव मन में अंतर्निहित  दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन माँ पराम्बा की कृपा अर्थात् निर्मल मति और आत्म-शक्ति के  जागरण से सँभव है।  अंतःकरण की पूर्ण शुचिता के उपरांत प्रस्फुटित "शुभता और दिव्यता" ही शक्ति आराधना की फलश्रुति है। इच्छा शक्ति,ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के रूप में  जो...