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Showing posts from April, 2025

स्वर्ण संस्कृति

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अक्षय तृतीया पर स्वर्ण संस्कृति                @मानव भारतीय संस्कृति में स्वर्ण केवल बहुमूल्य धातु नहीं  बल्कि धर्म,परंपरा और पारस्परिक प्रेम को  परिभाषित करने वाला तत्व है। सोना कोई आम धातु नहीं,  भारतीय लोकमानस के अंतर्मन में इसकी मंगल उपस्थिति है; इसका दान व संग्रहण दोनों ही एक आम भारतीय परिवार की जीवनशैली और विचार में व्याप्त है। इसकी पवित्रता और शुद्धता का ही महत्व है  कि इष्ट प्रभु के विग्रह स्वरूप को हम स्वर्ण आभूषण-अलंकरण से  सुसज्जित देखते हैं। वेदों में 'हिरण्य'  हमें धन,समृद्धि और दिव्यता से जोड़ता है;  ऋग्वेद में देवताओं के  वस्त्र,कवचऔर आभूषण  स्वर्ण जड़ित वर्णित हैं। सनातन सँस्कृति में सोने की पूजा की जाती है; मंदिरों में भेंट चढ़ाया जाता हैं; पंडित को दान दिया जाता है; इस श्रद्धा भाव के कारण  कमर के नीचे अधारणीय भी है।  हमारी संस्कृति में स्वर्ण के प्रति पूज्य भाव है  स्वर्ण सुसज्जित स्त्री लक्ष्मी का स्वरूप है; स्त्री का स्वर्ण उसका अपना 'स्त्री धन' है।  कैसी भी हैसियत...

मङ्गलदात्री तिथि

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  अक्षय तृतीया पर मङ्गलदात्री तिथि              @मानव वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया   "अक्षय तृतीया" तिथि अपने नामानुरूप स्वयंसिद्ध  और हर प्रकार से मंगलदात्री है।  ( धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु ) ज्योतिष की दृष्टि से महूर्तादि के लिए यह  सर्वोत्तमा तिथि मानी गई है।  पौराणिक तथ्यों के अनुसार  सतयुग और त्रेतायुग का शुभारंभ इसी दिन से हुआ है। सृष्टि के अभिवर्धन और अभिरक्षण की दृष्टि से  जगन्ननियन्ता श्रीहरि ने धर्म की भार्या मूर्ति के गर्भ से नर-नारायण के रूप में  चौथा अवतार इसी तिथि पर लिया। इस अवतार में ऋषि के रूप में मन-इंद्रिय का संयम करते हुए, कठिन तपस्या कर भगवान ने लोक को शिक्षा दी, कि तपस्या के द्वारा मनुष्य  जीवन और प्रकृति के  रहस्यों को समझकर,  लोकहितकारी कार्यों का  उत्तम प्रकार से सँपादन  करता और करवाता है। अनंतकोटि ब्रह्माण्ड नायक  परमेश्वर श्रीहरि ने अक्षय तृतीया तिथि को ही हयग्रीव अवतार लेकर वेदों की रक्षा की।  ( श्रीमद्भागवतमहापुराण ) निरंकुश हो गई राजसत्ता को सद...

आत्मा-परमात्मा का एकत्व

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  श्री वल्लभाचार्य जयन्ती पर आत्मा-परमात्मा का एकत्व               @मानव प्रमुख हिंदू संत और दार्शनिक, पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्री वल्लभाचार्य का जीवन  भगवान कृष्ण की दिव्य कृपा और भक्ति पर केंद्रित था।  उन्होंने शुद्धाद्वैत के  सिद्धांत को विकसित किया, जिसने आत्मा के साथ ब्रह्म की एकता पर जोर दिया। भक्तों और विद्वानों के लिए  आध्यात्मिक मार्गदर्शन का स्रोत  वल्लभाचार्य षोडश ग्रंथ,  सुबोधिनी जी और मधुराष्टकम् जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के रचयिता को जगद्गुरु जैसी उपाधियाँ  और कनकाभिषेक जैसे  सम्मान प्राप्त हैं। शुद्धाद्वैत दर्शन मानता है कि ब्रह्म (भगवान श्रीकृष्ण) ही एकमात्र सत्य है और यह सँसार भी उसी ब्रह्म का अभिन्न रूप है; माया से रहित, शुद्ध और वास्तविक। जीव भी ब्रह्म का अँश है  और उसके साथ उसका सँबंध प्रेम और सेवा का होना चाहिए; ब्रह्म शुद्ध है, जीव शुद्ध है  और जगत शुद्ध है; शुद्ध जीव और शुद्ध जगत का शुद्ध ब्रह्म से अभिन्न संबंध है। जगत का कारण रूप ब्रह्म शुद्ध है,मायिक नहीं है; ब्रह्म और जगत म...

धरती माँ

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  विश्व पृथ्वी दिवस पर धरती माँ           @मानव पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करता एक खगोलीय पिंड भर नहीं  यह अनेक रहस्यों से परिपूर्ण ऐसी दैविक अस्मिता है, जो आदिकाल से मनुष्य  और वनस्पतियों सहित  समस्त जीव-जंतुओं के  भरण-पोषण के साधन  सुलभ कराती रही है। माँ की भूमिका निभाती  परम आश्रयदात्री पृथ्वी देवी स्वरूप आराध्य है; पृथ्वी के प्रति श्रद्धाभाव  और उसकी अर्चना-स्तुति की प्रथा सभी पंथों में विद्यमान है। विश्व की प्रथम चिकित्सक  और उपचार प्रदाता के रूप में पृथ्वी का स्थान सर्वोपरि है; सभी औषधियाँ उन्हीं के  उद्यान की अङ्ग हैं। आदि समाजों को तन-मन से पृथ्वी से सतत जुड़ाव सुहाता था; हर दृष्टि से पृथ्वी से उनका सान्निध्य बना रहता,  जो उन्हें तन,मन,चित्त से  स्वस्थ और सकारात्मक  बनाए रखता। भवनों के निर्माण से पूर्व  भूमि पूजन की परंपरा है।  निर्माण कार्य में खोदाई से  पृथ्वी के आहत होने पर  क्षमा याचना के साथ भवन को अनिष्टों,बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है। धरती माँ से भरपूर ख...

धन्न गुरु तेग बहादुर

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  प्रकाश पर्व पर, धन्न गुरु तेग बहादुर            @मानव नवम गुरु तेग बहादुर जी का  भारतीय चिंतन धारा में  अपना मौलिक योगदान है; उन्हें नमन करने का अर्थ है  भारतीय अध्यात्म-चिंतन पर विचार करना।  गुरु तेग बहादुर जी ने  औरंगजेब के समय  धर्मांतरण की लहर को  अपने बलिदान के द्वारा  केवल रोका ही नहीं, बल्कि एशिया के देशों के सामने भारतीय अध्यात्म का नया अध्याय खोला। गुरु तेग बहादुर जी का  अवदान उनकी शाश्वत जीवन-दृष्टि में निहित है। गुरु तेग बहादुर जी की दृष्टि  केवल एक भूखण्ड पर  केंद्रित नहीं थी, वे पूरी सृष्टि की व्यथा को  आत्मसात कर मानवीय दुख-दर्द को हर लेना चाहते थे। वे भारत के जन-जीवन को  गुरमत दर्शन के माध्यम से  नई चेतना देते है; सँपूर्ण मानवता में आत्मबल का शाश्वत सँचार करना ही  उनका परम लक्ष्य था। गुरु जी की वाणी में प्रकृति के मानवीकरण सँग, अध्यात्मीकरण भी  विलक्षित होता है। गुरु जी द्वारा प्रस्तुत चिंतन  भक्ति के स्वर को शक्ति के माध्यम से भी  प्रस्तुत करने क...

आस्था,बल,बुद्धि के आगार

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  आस्था,बल,बुद्धि के आगार                @मानव सँस्कृति के लोक का कलेवर  अत्यन्त विशाल,व्यापक  और आमजन को  सामर्थ्यवान बनाने वाला है।  इसमें परिकल्पित परिवेश के पात्र देश- काल की सीमाओं का  अतिक्रमण करते हुए  विचार,प्रतिमा,प्रथाओं और विभिन्न अनुष्ठानों की  सहायता से सबके लिए उपलब्ध रहते हैं। उनके साथ कथाएँ और किंवदंतियाँ भी जुड़ती हैं क्योंकि उनसे लोगों को  जीवन जीने के लिए जरूरी समर्थन,प्रेरणा और शक्ति मिलती है।  राम-भक्ति के सिरमौर पवनसुत श्री हनुमान  शारीरिक बल और उत्तम कोटि की मेधा  या बुद्धि में श्रेष्ठ ऐसे ही विरल भारतीय व्यक्तित्व की सर्जना हैं। हनुमान जी विलक्षण हैं; वे परस्पर विरोध वाली  विशेषताएँ भी रखते हैं; मानवेतर होने पर भी गूढ़ राम-रसायन का तत्व उन्हीं के पास है। वे परिवार सदस्य न होकर भी "राम पंचायतन" के प्रमुख  और स्थायी सदस्य हैं; श्रीराम का स्मरण श्री हनुमान बिना अधूरा है।  प्रिय भक्त हनुमान को भगवान श्रीराम भरत सम सगा अनुज मानते हैं; भरतजी भक्त-शिरोमणि ह...

सत्य अन्वेषक महावीर

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  सत्य अन्वेषक महावीर             @मानव महावीर होने का अर्थ है  स्वयं ही सत्य का सँधान करना स्वयं को जानने का प्रयास करना शरीर की आसक्ति को समाप्त कर शुद्ध-बुद्ध आत्मा का  अनुभव करना। महावीर होने का अर्थ है जब तक संसार में हैं तब तक यहाँ रहते हुए भी  निर्विकार रहना; सँसार में रहकर निर्लिप्त रहना। तीर्थंकर महावीर भारत में जन्मे ऐसे परम वीतरागी साधक थे, जिन्होंने प्रत्येक आत्मा को  परमात्मा बनाने का पथ  प्रशस्त किया। उन्होंने धर्म के नाम पर  व्याप्त अन्यान्य परंपराओं की समीक्षा करके धर्म की सनातन परंपरा को  विश्व के समक्ष रखा। एक सर्प पर विजय पाने के कारण उन्हें वीर नाम से पुकारा गया और एक मदोन्मत्त हाथी को  वश में करने के कारण  उन्हें सन्मति व  वर्धमान भी कहा गया है। वैशाली के एक राजकुमार ने  सत्य के संधान की राह पकड़ी, उन्होंने तप किया और कैवल्य ज्ञान होने व सर्वज्ञ होने की दशा में जाना कि ईश्वर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं,  बल्कि मनुष्य स्वयं है।  उन्होंने आत्म-अनुसँधान के बल पर यह उद्घोषणा की...

शाश्वत श्रीराम

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  शाश्वत श्रीराम             @मानव निर्बल के बल तो राम ही होते हैं, ऐसा करते हुए श्रीराम  जाति-वर्ग नहीं, वास्तविक भक्ति और प्रेम को महत्व देते हैं।  वह जहाँ सबके प्रति उन्मुक्त भाव से उद्वार करते हैं, वहीं स्वयं अपने से निर्लिप्त बने रहते हैं। राम की कथा आम आदमी के जीवन में घुली है; सुख हो या दुख, हर्ष हो या विषाद, हर तरह के अवसर पर  श्रीराम को याद करते हुए  लोक-जीवन का पहिया घूमता है। रामनवमी वह माँगलिक तिथि है जिसने शाश्वत सत्य सनातन परमात्मा को मनुष्य रूप में अवतीर्ण कर  धरती को जीवन का वरदान दे दिया। श्रीराम मानवता के सर्जक  और पोषक हैं, विचार,वाणी एवं कर्म के मानदण्ड होने से  उत्कृष्ट जीवन की पद्धति हैं।  वह आदर्श से पहले यथार्थ नहीं, मंदस्मित के साथ जीवन का मधुर सँवाद हैं; जहाँ विवाद का कोई स्थान नहीं; इसीलिए वैरी भी उनके प्रशंसक हैं। यदि कण्टकाकीर्ण पथ के  अनुगामी होने से जीवन की मूक वेदना है, तो दीन-दुखियों के सच्चे सुहृद होने से मुखर सँवेदना भी। यद्यपि परमात्मा होने से  वे सबके आराध्य हैं, किं...

नवरात्र पर्व

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  नवरात्र पर्व                  @मानव देवी माँ दुर्गा का हर रूप एक अद्वितीय गुण या शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। शैलपुत्री शक्ति और स्थिरता का  प्रतिनिधित्व करती हैं; तो ब्रह्मचारिणी तपस्या का प्रतीक हैं और सिद्धिदात्री परम तृप्ति और ज्ञान प्रदायिनी हैं।  आदिशक्ति या आदि पराशक्ति या महादेवी माँ दुर्गा को  सनातन, निराकार, परब्रह्म, ब्रह्माण्ड से भी परे  एक सर्वोच्च शक्ति है। शाक्त संप्रदाय में  यह शक्ति मूल रूप में निर्गुण है, परंतु निराकार परमेश्वर जो न स्त्री है न पुरुष, उसे जब सृष्टि की रचना करनी होती है; वे आदि पराशक्ति के रूप में उस इच्छा रूप में ब्रह्माण्ड की रचना, जननी रूप में सँसार का पालन और क्रिया रूप में पूरे ब्रह्माण्ड को गति तथा बल प्रदान करते हैं। नवरात्र माँ के अलग-अलग रूप के  अवलोकन करने का दिव्य पर्व है; और नवरात्र काल आहार की शुद्धि के साथ  मंत्र की उपासना का काल है। नवरात्र में किए गए प्रयास,  शुभ-संकल्प बल के सहारे  देवी दुर्गा की कृपा से सफल होते हैं। नवरात्र पर हम काम,क्र...

आद्यशक्ति

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  आद्यशक्ति               @मानव सँपूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का मूल कारण शक्ति ही हैं,  जिसे ब्रह्मा,विष्‍णु व शिव  तीनों ने मिलकर माँ नवदुर्गा के रूप में सृजित किया; इसलिए माँ दुर्गा में ब्रह्मा,विष्‍णु एवं शिव तीनों की शक्तियाँ समाई हैं।  जगत की उत्पत्ति, पालन एवं लय तीनों व्यवस्थाएँ  जिस शक्ति के आधीन  सँपादित होती हैं, वही हैं पराम्बा माँ भगवती आदिशक्ति। माँ ही आद्यशक्ति हैं।  सर्वगुणों का आधार।  राम-कृष्ण,गौतम,कणाद आदि ऋषि-मुनियों,वीर-वीरांगनाओं की जननी हैं। नवरात्र कालखण्ड में  देवताओं ने दैत्यों से परास्त होकर आद्या शक्ति की प्रार्थना की थी और उनकी पुकार सुनकर  देवी माँ का आविर्भाव हुआ।  उनके प्राकट्य से दैत्यों के संहार करने पर देवी माँ की स्तुति देवताओं ने की थी। नवरात्र राक्षस महिषासुर पर देवी माँ दुर्गा की विजय का प्रतीक है, जो नकारात्मकता के विनाश और जीवन में सकारात्मकता के पुनरुद्धार का प्रतीक है। ✍️मनोज श्रीवास्तव

आत्मोत्थान पर्व

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  आत्मोत्थान पर्व               @मानव चैत्र नवरात्र देवी भगवती की उपासना से आत्मिक शक्ति, मानसिक शाँति और शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने का एक अलभ्य अवसर है। इस कालखण्ड में  आहार-विहार का संयम  व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और आंतरिक शक्तियों को  जाग्रत करने का कार्य करता है। देवी दुर्गा इच्छा,ज्ञान और क्रिया शक्ति की प्रतीक हैं; वे सँपूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारभूत और क्रियात्मक शक्ति के रूप में आराधित होती हैं। माँ की उपासना से भक्तों को आत्मिक बल,  जीवन में संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति  प्राप्त होती है। नवरात्र के नौ दिनों में किया गया तप और साधना  व्यक्ति को सभी प्रकार की  नकारात्मक शक्तियों से मुक्त कर कल्याणकारी जीवन की ओर प्रेरित करता है। नवरात्र का कालखण्ड  निस्संदेह आत्मिक उत्थान  और व्यक्तिगत विकास के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है! मानव मन में अंतर्निहित  दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन माँ की कृपा अर्थात् निर्मल मति और आत्म-शक्ति के  जागरण से सँभव है।  अंतःकरण की पूर्ण शुचिता से प...

देवी के विविध नाम

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  देवी के विविध नाम                     @मानव चण्डिका देवी को नमन है! जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते   इति ' जयन्ती ' क्योंकि माँ सबसे उत्कृष्ट एवं विजयशालिनी हैं। मङ्ग जननमरणादिरूपं  सर्पणं भक्तानां लाति  गृह्णाति नाशयति या सा मङ्गला मोक्षप्रदा; जो अपने भक्तों के  जन्म-मरण आदि  संसार-बन्धन को दूर करती हैं, उन मोक्षदायिनी मंगलमयी  देवी का नाम ' मंगला ' है। कलयति भक्षयति प्रलयकाले सर्वम् इति काली; जो प्रलयकाल में सम्पूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना लेती है;  वह ' काली ' है। भद्रं मङ्गलं सुखं वा कलयति स्वीकरोति  भक्तेभ्यो दातुम् इति  भद्रकाली सुखप्रदा; जो अपने भक्तों को देने के लिये ही भद्र सुख किंवा मंगल  स्वीकार करती है, वह ' भद्रकाली ' है। हाथ में कपाल तथा गले में मुण्डमाला धारण करने वाली ही " कपालिनी " है। दुःखेन अष्टाङ्गयोग कर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते प्राप्यते या सा दुर्गा" जो अष्टांगयोग, कर्म एवं उपासनारूप  दुःसाध्य साधन से प्राप्त होती हैं, वे जगदम्बिका ' दुर्गा ' कहलाती हैं। ...

नवदुर्गा दर्शन

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  नवदुर्गा दर्शन                @मानव देवी की नौ मूर्तियाँ हैं जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं उनके पृथक पृथक नाम  बताए जाते हैं। प्रथम नाम शैलपुत्री का है, देवी शैलपुत्री गिरिराज हिमालय की पुत्री  'पार्वतीदेवी' हैं; यद्यपि ये सबकी अधीश्वरी हैं, तथापि हिमालय की तपस्या  और प्रार्थना से प्रसन्न हो  कृपापूर्वक उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। ब्रह्म चारयितुं शीलं यस्याः सा ब्रह्मचारिणी; सच्चिदानन्दमय  ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति कराना जिनका स्वभाव हो, वे 'ब्रह्मचारिणी' हैं। चन्द्रः घण्टायां यस्याः  सा-आह्लादकारी चन्द्रमा जिनकी घण्टा में स्थित हों, उन देवी का नाम 'चन्द्रघण्टा' है। कुत्सितः ऊष्मा कूष्मा-  त्रिविधतापयुतः संसारः, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां  यस्याः सा कूष्माण्डा। अर्थात् त्रिविध तापयुक्त संसार जिनके उदर में स्थित है, वे भगवती 'कूष्माण्डा'  हैं।  भगवती की शक्तिसे उत्पन्न हुए सनत्कुमार का नाम स्कन्द है; उनकी माता होने से वे 'स्कन्दमाता' कहलाती हैं।   (छान्दोग्यश्रुति) देवताओं का कार्य ...