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Showing posts from February, 2025

राष्ट्रीय एकता वाहक शिव

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  राष्ट्रीय एकता वाहक शिव               @मानव जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव हैं; जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं,  वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं; जो नित्य,सत्य,जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। धर्मग्रंथों में भगवान शिव को  'कालों का काल' और 'देवों का देव' अर्थात् 'महादेव' कहा गया है। एक होते हुए भी शिव के  नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखण्ड परम तत्व हैं,  इन्हीं की अनेक विभूतियाँ  अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं। यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से  'सगुण ईश्वर' और 'निर्गुण ब्रह्म' कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से  संबोधित किए जाते हैं। शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है,...

शिव की पूर्णता शक्ति से

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  शिव की पूर्णता शक्ति से            @मानव शक्ति को अपने शरीर का आधा भाग सौंपकर पूर्णता को प्राप्त करते हैं  भगवान अर्धनारीश्वर! यह दर्शाता है कि स्त्री की शक्ति को  स्वीकार किए बिना पुरुष कभी पूर्ण ही नहीं हो सकता। शिव पत्नी देवी पार्वती को  हमेशा बराबरी का स्थान देते हैं; यह रिश्तों की सच्ची साझेदारी है; भोलेनाथ देवी पार्वती के  मित्र भी हैं और गुरु भी; साथ ही वे उनके प्रति समर्पित भी। स्त्री और पुरुष के इसी समभाव से प्रकृति भी होती है लयबद्ध और बनता है समाज! प्रकृति के साथ प्राणी में  करुणा और समभाव जगाने का पावन अवसर है महाशिवरात्रि! शिव न तो कोई वैयक्तिक स्वरूप हैं और ना ही कोई भौतिक सत्ता का प्रतिरूप। जो कुछ साँसारिक गतिविधि अथवा सँसार के केंद्र में हो रहा है या ऐसा कुछ घटित होने के  क्रम में परिकल्पित है, उसका सारतत्व अथवा निचोड़ का मूल बिंदु ही शिव तत्व है। अतः शिवत्व की परिकल्पना  न केवल भारतवर्ष, अपितु संपूर्ण विश्व के लिए  आकाश तत्व जैसी है। जिस तत्व के बिना  जीवन-अस्तित्व की कल्पना असंभव है, उसकी...

रामकथा जननी प्रयाग

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  रामकथा जननी प्रयाग             @मानव " राम विराजमान हो गए,  राम विवाद नहीं,संवाद हैं; राम इस देश का समाधान हैं, विजय नहीं, विनय हैं।" प्रयागराज की धरा रामकथा जननी है। अयोध्या से वनवास के लिए  जाते समय भगवान राम का  पहला पड़ाव किसी राजा या धनवान के यहाँ नहीं था,  चुना तो प्रयाग में गङ्गा नदी किनारे पावन तट  श्रृंगवेरपुर धाम को। पहली बार मिले तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति केवट से! भरत ने भी राजपाट नहीं माँगा, धनधान्य नहीं चाहा; केवल राम के चरणों में  अनुरक्ति माँगी।  राम शबरी के पास स्वयं जाते हैं; घायल गिद्ध (जटायु) का सिर अपनी गोद में रख लेते हैं; यही समाज की समरसता है; यह गतिविधियाँ रामराज्य के प्रथम नागरिक की भूमिका का दर्शन कराती हैं।   ✒️मनोज श्रीवास्तव

मानवता का महामिलन

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  मानवता का महामिलन             @मानव महाकुम्भ केवल एक महाउत्सव नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की दिव्य धारा है, जहाँ आस्था,श्रद्धा और अध्यात्म का पवित्र सँगम होता है। महाकुम्भ सँपूर्ण मानवता का महामिलन है; यह भारतीय सनातन की  अद्भुत विविधता, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि  और आध्यात्मिक गांभीर्य का जीवंत उदाहरण है।  महाकुम्भ हिंदू आस्था, हिंदू अस्मिता और हिंदू आत्मगौरव का संकेत है; यह हिंदू समाज की  पद्सोपानीय संरचना से  उपजे जातीय विभाजन को  लाँघने की शुरुआत है। महाकुम्भ विविधता में एकता के कथ्य को रेखाँकित करता है; जो हिंदू समाज में बढ़ते विखण्डन पर विराम की बानगी है। यह अपनी धार्मिक  साँस्कृतिक धरोहरों की  वैश्विक स्तर पर समुचित 'मार्केटिंग' का अप्रतिम प्रतिमान है। महाकुम्भ से निकले संकेतों में अध्यात्म,संस्कृति,  राजनीति,अर्थव्यवस्था और प्रबंधकीय कौशल के  महत्वपूर्ण सँदेश गुम्फित हैं। माँ गङ्गा में एक डुबकी से  हृदय निर्मल हो जाता है  और मोक्ष की अनुभूति होती है कुम्भ स्नान के सौभाग्य से  मन आन...

एकता की परंपरा है कुम्भ

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  एकता की परंपरा है कुम्भ           @मानव कुम्भ महामिलन है,  महासम्मेलन है; यदि कुम्भ (घड़े) को देखें, तो उसका उदर बड़ा है और मुख संकीर्ण है। तात्पर्य यही है कि जो कहना है, वह लघु रूप से सूत्र रूप में कह देता है,  यद्यपि उसके उदर में तो सब शास्त्र होते हैं। इतना उदार उसका पेट है; जल में कुम्भ है, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी।     ( कबीर ) कुम्भ हमारी सँस्कृति से जुड़ा है, हर माँगलिक कार्य में,पूजा में कलश स्थापना होती है; मंत्र भी ऐसे हैं कि कलश के मूल,मध्य,मुख में विविध देवता वास करते हैं। हमारी प्रवाही परंपरा में कुम्भ की बड़ी महिमा है, हम गङ्गा को घर नहीं ला सकते, लेकिन कुम्भ में भरकर गङ्गा को घर में ला सकते हैं। कुम्भ का मेला मूल में तो स्वयंभू है; कुम्भ नैसर्गिक है,कुदरती है;  कुम्भ अस्तित्व की व्यवस्था है, मानव सर्जित नहीं है। कुम्भ में सब आए हैं, लेकिन स्पर्धा के लिए नहीं,  त्रिवेणी में स्नान करने के लिए, कुम्भ जैसी एकता कहीं नहीं मिलेगी। यहाँ कोई नहीं पूछता कि कौन ब्राह्मण है, कौन क्षत्रिय है, कौन किस जाति का है, किस...

सनातन की पावनता

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  सनातन की पावनता              @मानव भक्त और भगवान का महानतम मिलन है कुम्भ! स्व-स्वरूप में स्थित होने का  विराट आयोजन है यह कुम्भ! जहाँ ज्ञान की सरस्वती,  भक्ति की गङ्गा और कर्म की यमुना का  महायोग होता है। वेदों की ऋचाएँ भी ज्ञान,भक्ति और कर्म का ही  अमृतमय शब्दरूप हैं, जो श्रुति मार्ग से जाकर  हृदय देश में मिल जाती हैं।  अमृत तो मिलन में ही बरसता है, वियोग में तो अश्रु प्रवाह होता है; ईश्वर की इसी संपूर्णता के लिए भक्त उमड़ रहे हैं। यह केवल भारत में सँभव है, यहाँ नदियाँ भी मिलती हैं,  धर्म भी मिलते हैं, परंपराएँ और मान्यताएँ भी मिलती हैं। सँत,गृहस्थ,विद्वान,  निर्गुण-निराकारवादी,  सगुण-साकारवादी, भक्त,वेदान्ती सब भगवान के बहुरंगे रूप,गुण,कलाओं को यहाँ देखने आते हैं। यही इस देश की संस्कृति है,  यही सनातनता है, जो मिलकर विलीन हो जाने को अपनी पूर्णता मानती है। जैसे वेद अपौरुषेय हैं, वैसे ही कुम्भ की परिकल्पना भी अपौरुषेय है; अपौरुषेय व्यवस्था में जब शासन और व्यवस्था  अपनी आस्था के पुष्प  व...

धर्म का कुम्भ

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  धर्म का कुम्भ             @मानव धर्म सूर्य की भाँति है, यह बिना किसी भेदभाव  सबको आलोक एवं मंगल बाँटता है। धर्म जीवन का अभिन्न अंग है; असंख्य लोग सबसे गहन श्रद्धा के साथ  जिसे पूजते हैं, वह धर्म ही है। धर्म ही कामधेनु है; धर्म ही कल्पतरु है; जिसने धर्म को सही रूप में  स्वीकार कर लिया,  जीवन की सर्वोच्च निधि को  उसने प्राप्त कर लिया। भारतीय संस्कृति का आत्मा धर्म है। धर्म बहुत व्यापक है। धर्म तो सत्य,करुणा और अहिंसा है। आत्मशुद्धि का साधन है।  भारतीय मनीषा में धर्म  केवल ईश्वरीय आस्था ही नहीं है, वह वैश्विक व्यवस्था है; सृष्टि का सार्वभौम नियम है;  जीवन पद्धति है; वह आंतरिक प्रकाश है;  आनंदमयी चेतना का स्पंदन है; धर्म वह आचार संहिता है,  जिसमें सबका अभ्युदय निहित है। धर्म मनुष्यता का मंत्र है,  उन्नति का तंत्र है; पशुता को मनुजता में  रूपांतरित करने का यंत्र है।  धर्म एक मर्यादा है, वह जीवन को मर्यादित करता है; धर्म उत्कृष्ट मंगल है; समस्त विघ्न,बाधाओं,कष्टों का निवारक एवं सिद्धिदायक है;...

प्रेम

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  प्रेम             @मानव प्रेम हृदय की कोमल अनुभूति नहीं, अपितु दो आत्माओं के बीच  विश्वास की मजबूत कड़ी है  जो हर विपरीत परिस्थिति में  अडिग रहती है। समर्पण प्रेम का आधार है, जिससे एक दूसरे के हृदय के स्पंदन की अनुभूति होती है; जो एक दिवसीय नहीं हो सकती। प्रेम एक ऐसी अभिव्यक्ति है  जिसमें शब्दों से अधिक  भाव महत्वपूर्ण होते हैं, यही भाव प्रत्येक रिश्ते का संबल और उसके सशक्त बनाने वाला स्तंभ बनता है। प्रेम में कठिनतम परीक्षा होती है जब समय की कसौटी पर रिश्तों की परख होती है;  पिता का आश्वासन सुरक्षा का अहसास है; शिक्षक का मनोबल शिष्य की प्रेरणा बन जाती है; विवाह के समय सुख-दुख में साथ निभाने का वादा रिश्ते की नींव वैवाहिक जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाने वाला ईंधन हो जाता है। सँबंधों के सागर मंथन से निकला अमृत प्रेम है पर छल विष के समान है; स्नेहसिक्त संबंधों में जब छल का विष घुल जाता है तो विश्वास की नींव दरकने लगती है। अविश्वास न केवल हृदय को छलनी करता है,  बल्कि रिश्तों को गहरी गर्त में धकेल देता है  जहाँ से निकल ...

माघ पूर्णिमा

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  माघ पूर्णिमा        @मानव धर्मपरायण मानवों के लिए धार्मिक,आध्यात्मिक,  साँस्कृतिक,लौकिक तथा पारलौकिक उन्नति के लिए पुण्यभूमि भारतवर्ष में  किए गए विधानों में माघी पूर्णिमा विशिष्ट है। सिद्धांत एवं संहिता ज्योतिष में महीनों का कालमान नौ प्रकार का होता है, जिनमें चार प्रकार के महीने  सौरमास, चाँद्रमास, सावनमास तथा नाक्षत्रमास ही नित्य मनुष्यों के व्यावहारिक जीवन में  उपयोग होते हैं। इन मासों में वैवाहिक कृत्यों में सौरमास को यज्ञ-अनुष्ठान,दान,जप-तप,व्रत में सावन पूर्णिमाँत मास को  तथा पितृ कार्यों हेतु  चाँद्रमासों की महत्ता है।      ( गर्गाचार्य )   पूर्णिमाँत मास जिस नक्षत्र से युक्त होता है  (पूर्णिमा तिथि पर जो नक्षत्र है) उसी पर उस महीने का नाम ऋषियों द्वारा रखा गया है।       (नारद सँहिता ) चित्रा नक्षत्र से चैत्र,  विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, आषाढ़ से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, भाद्रपदा से भाद्रपद,  अश्विनी से आश्विन,  कृत्तिका से कार्तिक,  मृगशिरा से मार्गशीर्ष,...

एकात्मता,समरसता का मूल

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  एकात्मता,समरसता का मूल               @मानव महाकुम्भ हमारे गौरवशाली सँस्कृति  भारतीय समाज के धार्मिक,  साँस्कृतिक और सामाजिक  जीवन के प्रत्येक पहलू को सँजोए केवल एक धार्मिक आयोजन या स्नान का पर्व नहीं,  बल्कि समाज के सुधार,  सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक उन्नति का  महत्वपूर्ण मञ्च है, जो प्रत्येक पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का  अवसर प्रदान करता है। यह सनातन की ऐसी दिव्य परंपरा है, जो कालांतर से आस्था और मानवता के सर्वोत्तम आदर्शों को  संगठित करती आ रही है।  सनातन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यह न केवल व्यक्ति को,  बल्कि समाज और राष्ट्र को भी दिशा प्रदान करता है। यहाँ सँत-महात्मा और ऋषि-मुनियों का सँगम होता है, जो समाज का मार्गदर्शन  और व्याप्त समस्याओं का  समाधान प्रस्तुत करते थे। कुम्भ न केवल व्यक्तिगत आस्था, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है; जहाँ सभी पँथ,जाति,वर्ग  और समुदायों के लोग एकत्र होते हैं। इस एकता में न केवल  सामाजिक समरसता की  भावना होती है, बल्कि यहाँ भारतीय सँस्...

पूर्णता,शाँति और एकता का निदर्शन

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  पूर्णता,शाँति और एकता का निदर्शन           @मानव पूर्णता का प्रतीक है कुम्भ; ब्रह्म ज्ञानी संतों और सिद्धों को कुम्भ कहकर भी संबोधित करते हैं। घटपट वेदांत की दृष्टि से  जीव घट है, आत्मा आकाश रूपी है और मानव समुदाय घटों का एक समावेश। कुम्भ ऐसा विचित्र मेला है,  जहाँ वे संत मिलते हैं, जिन्हें कुछ भी नहीं चाहिए  और वे साँसारिक लोग भी मिलते हैं, जिन्हें बहुत कुछ चाहिए।  इस महासँगम में तपस्वी,  जिन्हें तपस्या के बल के  अहंकार में नहीं उलझना,  अपने अर्जित पुण्य सब पर बिखेर देते हैं। यह एक सुअवसर है सूक्ष्म और स्थूल जगत के सबंध को अनुभव करने का, सिद्धों और साधकों की  पावन,कल्याणमयी,  रोमांचक ऊर्जा में अनुग्रहीत होने का। कुम्भ एक आध्यात्मिक महोत्सव है, जहाँ क्षणभंगुर सँसार में  उलझे व्यक्ति को जीवन के परम लक्ष्य पर  चिंतन करने, अतृप्त मन को निज पूर्णता से अवगत होने  और परमात्मा से अपने  अक्षुण्ण संबंध को अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। योग यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, जप यज्ञ, और भक्ति यज्ञ का अनुपम समा...

ज्ञान परंपरा का दिव्य अनुष्ठान

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ज्ञान परंपरा का दिव्य अनुष्ठान                  @मानव कुम्भ मूलतः  तप,साधना,ध्यान,विमर्श  और वैचारिक आदान-प्रदान का अप्रतिम पर्व है। कुम्भ ज्ञान के मंथन का अवसर है; इसी से ज्ञान की ऊर्जा का  विस्तार होता है और विचारों के नए गवाक्ष खुलते हैं। ऐसे पावन अवसर पर माँ सरस्वती का पूजन  अत्यंत कल्याणकारी और मंगलकारी है। ज्ञान के प्रभाव के कारण  ज्ञान के समान पवित्र और शुद्ध करने वाला अन्य कुछ नहीं है;  ' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।'  (गीता,चतुर्थ अध्याय) हमारे शास्त्रों में ज्ञान की उपासना, ज्ञान की आराधना और ज्ञान के दान को  सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भारतीय दर्शन में ज्ञान को  सर्वश्रेष्ठ निधि कहा गया है; ज्ञान-दान ही ऐसा दान है जो लौटाया नहीं जा सकता है; इसलिए ज्ञान-प्रणयन करने वाले गुरु से कभी उऋण नहीं हो सकते। विद्या सबसे बड़ा धन है; विद्या या ज्ञान की निधि ही है जो हमारा अंत तक साथ देती है; निरंतर व्यय करने पर भी जिसमें निरंतर वृद्धि होती है,  ऐसा सबसे बड़ा धन विद्या है; ' व्यये कृते व...

ज्ञान का सदा वसन्त

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  ज्ञान का सदा वसन्त               @मानव (१) वसंत की पगचाप सुनाई पड़ते ही रूप-रंग-रस और सौरभ से  समृद्ध हुई धरती अपने हृदय का संचित राग  उड़ेल देने को उत्सुक है। बसंत सभी ऋतुओं का अधिपति है, यह ऋतुराज है। इसके आश्रय से चराचर जगत में सर्वत्र माधुर्य और मनोहरता का प्रसार हो जाता है; बसंत इस सृष्टि-यज्ञ का घृत है- ‘ वसंतोऽस्यासीदाज्यं ।’ यह ब्रह्मण्ड जिसमें हमारा जीवन अधिष्ठित है, वसंत इसका घी है, ग्रीष्म ईंधन है और शरद हवि है। वसंत के घी होने में उसका वैशिष्ट्य निहित है।  घी स्नेह है, यह रस और राग का कारक है; वसंत ही प्रिय है ‘सर्वं प्रिये चारुतरं वसंते।’    (महाकवि कालिदास) ऋतुओं के राजा वसंत का  आगमन हुआ। 'आएल रितुपति राज बसंत'         (विद्यापति) उसके आगमन पर केसर के पुष्पों ने स्वर्णदण्ड को धारण किया; वृक्षों के नए पत्ते राजा के लिए आसन बने; राजा वसंत के सिर पर चंपा के पुष्पों का छत्र  सजाया गया है। आम्र मंजरी ऋतुराज के सिर का मुकुट बनी हुई है और कोयल उसके सामने  पञ्चम स्वर में गा रही ह...

जीव-परमात्मा मिलन पर्व

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  जीव-परमात्मा मिलन पर्व               @मानव कुम्भ का शब्दिक अर्थ घट या घड़ा है; आध्यात्मिक भाषा में घट का तात्पर्य है-हृदय; महा का तात्पर्य है-  श्रीमन्ननारायण- श्रीहरि श्रीगोविंदादि  भगवन्नाम-गुण-धाम। हृदय में भगवान का नित्य वास है; जीव और परमात्मा का मिलन ही महाकुम्भ है। यह वैदिक-पौराणिक मान्यता का महापर्व है,  जहाँ विभिन्न क्षेत्र-भाषा-संस्कृति के  साँस्कृतिक मूल्यों और मानव समाज का  अद्वितीय सँगम होता है। देवराज इन्द्र पुत्र जयन्त  जब अमृत कलश को लेकर  आकाशीय मार्ग से देवलोक जा रहे थे, उस समय चन्द्र-सूर्यादि ने  उसकी रक्षा की थी; तत्समयानुसार ही वर्तमान राशियों पर  चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुम्भ का योग होता है। जब देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में और ग्रहों के राजा मकर राशि में होते हैं तो महाकुम्भ का आयोजन  तीर्थ प्रयागराज में किया जाता है। जब देवगुरु बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्यदेव मेष में होते हैं तब धर्मनगरी हरिद्वार में  महाकुम्भ का आयोजन होता है। जब सूर्यदेव मेष राशि में...